जो घर आंगन शादी के बाद पराया लगने लगे उस पर क्या बेटी अपना अधिकार जताना चाहेगी ?

इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने जैसे भारतीय परिवारों में हलचल पैदा कर दी है। पैतृक संपत्ति में बेटी को भी बराबर अधिकार मिलने की घोषणा के बाद इस पर बहस होने लगी है कि अधिकार केवल संपत्ति पर ही नहीं बल्कि बेटी व दामाद का कर्तव्य माता-पिता को देखने एवं कर्ज उतारने का भी होना चाहिये। बिल्कुल सही बात है, अधिकार के साथ कर्तव्य भी जुड़ा होता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो यह बात सच है कि बेटियों का जुड़ाव माता-पिता के साथ दिल से होता है, और वह किसी भी सूरत में उन्हें तकलीफ से बचाना चाहती हैं। लेकिन संपत्ति में हिस्सा मिले तब ही वह मां-बाप को देखेगी, यह तो व्यापारिक बातें हैं।


यह और बात है कि जो घर आंगन बेटी को शादी के बाद पराया लगने लगे उस पर कौन सी बेटी अपना अधिकार जताना चाहेगी। फिर भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक मामले में जरूर स्वागत योग्य है कि इस कानून के बनने से विशेष परिस्थिति में जब कोई बेटी अपनी मिट्टी की ओर रूख करेगी तो उसे सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार मिलेगा। मगर इस फैसले से परिवार में नई संरचना और परिभाषा जरूर बनती दिखेगी। शायद दावा करती बहनों से भाईयों के रिश्तों में खटास भी देखने को मिले। आखिर संपत्ति होती ही ऐसी है, जिसका मोह अपनों को मानसिक रूप से भी अलग कर देती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भाई-भाई में बढ़ती दूरी है, क्योंकि पारंपरिक एवं सामाजिक व्यवस्था के चलते उनमें बराबर रूप से संपत्ति का बंटवारा होता है। जरा भी ऊंच नीच उन्हें लड़ने पर उतारू कर देता है। फिर उनके रिश्ते में मिठास खत्म होने लगती है। एक ही माता-पिता के संतान होते हुए भी वह प्रतिद्वन्दियों की तरह व्यवहार करते नजर आते हैं। आपसी समन्वय का भाव खत्म होने लगता है, और यह सारे विकार संपत्ति की हिस्सेदारी से पैदा होते हैं। आज देश में ऐसे बहुत कम घर हैं, जिनमें भाईयों का प्रेम बचपन की तरह निश्छल बना है। परिवारों के टूटने का कारण यह संपत्ति है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जो नई व्यवस्था बनी है, भले ही बहनें दावा न करें, लेकिन भाईयों को वह हिस्सेदार लगने लगेगी  ऐसा कहा जा सकता है।


वर्षों से जो पारिवारिक संतुलन के लिये सामाजिक व्यवस्था बनी है, वह पारम्परिक तौर पर चल भी रही है। अधिकांश बेटियां शादी के बाद अपने ससुराल को घर और मायके को पराये की तरह महसूस करती हैं। उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि वह घर जहां बड़ी हुई वहां उससे परायों जैसा व्यवहार भी होने लगता है। किसी भी सामान को स्पर्श करने से पहले अचानक ठिठक जाती हैं, कि यह अपना नहीं है। घर-आंगन, खेत खलिहान हर चीज में परायापन। एक घर से डोली और दूसरे घर से अर्थी उठने के सिद्धांत पर जैसे धकेला जाता रहा है। ऐसा इसलिये कि जिस घर में जन्म हुआ, वहां फिर अधिकार से न लौटे। यह वाकई घिसी-पिटी और बेटियों को उस पर कुर्बान करने की प्रथा रही है। घरों में बेटियों को दूसरे की संपत्ति की तरह ही पाला जाता है, और वक्त आने पर उसे वहां छोड़ दिया जाता है। कई घरों में माता-पिता खुद अपने बच्चों में भेद-भाव करते हैं, जो निश्चित तौर पर खत्म होना चाहिये। लिहाजा, भले ही कोर्ट ने एक घर में लड़कियों को भी लड़कों के बराबर आर्थिक बराबरी की सुरक्षा दी है, मगर लड़कियों के लिये सबसे जरूरी उस सोच को खत्म करने की है, जो एक ही घर में उनके अस्तित्व पर चोट करती है।


 


Popular posts from this blog

समय की मांग है कि जड़ से जुड़कर रहा जाय- भुमिहार महिला समाज।

जन वितरण के सामान को बाजार में बेचे जाने के विरोध में ग्रामीणों ने की राशन डीलर की शिकायत।

पश्चिमी सिंहभूम चाईबासा जिला में नये डीसी ने पद संभालते हुए कहा-जिले के सभी लोगों को सशक्त करना मेरी प्राथमिकता