क्यों पारंपरिक पेशे से नहीं जुड़ना चाहती है, कुम्हारों की युवा पीढ़ी ?

इन दिनों लोग बीते सालों की अपेक्षा अधिक संख्या में मिट्टी के घड़े खरीदते नजर आ रहे हैं, लेकिन इन्हें बनाने वाले कुम्हारों में ज्यादा खुशी नहीं है। इनका कहना है कि वर्षों की परंपरा के चलते इन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को नहीं छोड़ा, लेकिन इनकी वर्तमान और युवा पीढ़ी इस कला को सीखने और इसके जरिये अपना जीवन यापन करने से दूर भाग रही है।


पारंपरिक रूप से वर्षों से मिट्टी को आकार देने में लगी कमली देवी(बदला हुआ नाम) कहती हैं, कि उनके बच्चे इस कला को नहीं सीखना चाहते हैं। उनके अनुसार, इस पेशे में मेहनत ज्यादा और कमाई काफी कम है। इसलिये वह कोई अन्य नौकरी करके अच्छा जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। ऐसे में कमली देवी अपनी पारंपरिक कला को खत्म होते नहीं देखना चाहती हैं। चेहरे पर एक उदासी है।


केवल कमली देवी ही नहीं, यह तमाम कुम्हारों का दुख बनता जा रहा है। वे अपनी इस कला के धरोहर को बचाना चाहते हैं, इसलिये सरकार से गुजारिश की है कि इसके लिये प्रोत्साहन के साथ प्रचार-प्रसार करे ताकि लोगों में इसकी जागरूकता बढ़े। तब शायद कुम्हारों की युवा पीढ़ी भी इस कला को संजोने एवं आगे बढ़ाने में संकोच नहीं करेगी।    


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