अब समय आ गया है, जेएनयू में हुई घटनाओं के मूल में जाकर चिंतन करने का--मृदुला सिन्हा


अब समय आ गया है कि जेएनयू में हुई घटनाओं में जो प्रमुख बातें कहीं दब गयी थी उन्हें  उजागर कर चिंतन करने का। इनके मूल में जाकर इन समस्याओं का समाधान खोजना होगा। यह बात गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा नेहरू स्मारक संग्रहालय में जेएनयू, शिक्षा और राजनीति विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कही।


कार्यक्रम के समय को उचित बताते हुए उन्होंने कहा कि देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रमुखों को एक मंच पर लाकर आयोजकों ने ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर देश में बहस छेड़ी है जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। इस दौरान अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में अतुल कोठारी ने कहा कि जेएनयू में असहमति की परिणिति जैसी उग्रता में हुई, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी।


घटना का हिंसात्मक पक्ष प्रमुखता से देश और विश्व के सामने गया परन्तु शिक्षा एवं शैक्षणिक वातावरण की जो हानि हुई उस पर चर्चा नहीं हुई और यही कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य था। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों को अतार्किक रूप से अनुदान दिए जाने पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि सरकार देश के सुदूर क्षेत्र में चल रहे शिक्षण संस्थानों को कुछ लाख रूपये का अनुदान देती है वहीं जेएनयू जैसे कुछ संस्थानों को 500 करोड़ तक देती है।  


सरकार को अनुदान देने की व्यवस्था का पुनरावलोकन करने की आवश्यकता है। वहीँ फीस के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि जो छात्र गाड़ी से परिसर में घूमता है क्या वह भी हॉस्टल का 10 रूपये शुल्क देगा, इस पर विचार करने की आवश्यकता है।


जेएनयू के लगभग 90 प्रतिशत छात्रों को 2000 से लेकर 47000 रुपये तक स्कॉलरशिप मिलती है इन सभी बिंदुओं का समावेश करते हुए फीस पर चर्चा करना उचित होगा। इस पर आगे बताते हुए उन्होंने कहा कि मात्र जेएनयू में ही नहीं बल्कि देश के सभी शिक्षण संस्थानों में शुल्क के अनुपात पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है।



कार्यक्रम में मुख्यरूप से देश के 13 केंद्रीय संस्थान जैसे एनबीटीए एआईयूए एनआईओएसए आईसीएचआरए एनबीएए केंद्रीय विद्यालय संगठनए जवाहर नवोदय संगठनए एनआईटीए एनसीआरटी के प्रमुख साथ ही देश के 9 प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के कुलपति समेत वरिष्ठ शिक्षाविद, जेएनयू के पूर्व व वर्तमान छात्र एवं विभिन्न महाविद्यालयों के प्रोफेसर ने मिलकर विषय पर गहन चर्चा की और आयोजकों द्वारा प्रेषित प्रस्ताव पर सुझाव दिए।


 इस अवसर पर अपनी बात रखते हुए एनआईओएस के अध्यक्ष व जेएनयू के पूर्व छात्र सी.बी. शर्मा ने कहा कि जेएनयू की हिंसा पूर्णरूप से प्रायोजित थी।  उन्होंने 1983 की घटना का हवाला देते हुए बताया कि जेएनयू में विचारधारा की लड़ाई व बहस का पुराना इतिहास रहा है। किसी समय इसे अनिश्चितकाल के लिए बंद भी किया जा चुका था तो ऐसे में इन प्रायोजित हिंसक घटनाओं के कारण वर्तमान प्रशासन पर सीधे ऊँगली उठाने के बजाय इस प्रवृति के मूल में जाकर समस्याओं का हल निकालने की आवश्यकता है।


 आईआईएमसी के पूर्वअध्यक्ष व जेएनयू में विजिटिंग प्रोफेसर के.जी. सुरेश ने कहा कि जेएनयू में रणनीतिक परिवर्तन की जरुरत है। इग्नू के सम.कुलपति रविंद्र कान्हरे ने घटना को निंदनीय बताते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में लोकतांत्रिक ढंग से विरोध किया जाना चाहिए परन्तु इस लोकतांत्रिक अधिकार का दुरूपयोग नहीं किया जाना चाहिए। सभी शिक्षाविदों ने एक स्वर में हिंसा को नकारा।


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