अब रबिनाथ नहीं रहेगा निरक्षर

क्या दिव्यांग होना कोई अपराध है..क्या दिव्यांग को शिक्षा का लाभ लेने का कोई अधिकार नहीं है…यह सवाल झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला स्थित पोटका प्रखंड के कलिकापुर गांव में रहने वाले गरीब विधवा के 23 वर्षीय पुत्र रबिनाथ भगत के मन में जरूर आता होगा। दरअसल रबिनाथ बिल्कुल निरक्षर हैं। रबिनाथ जन्म से ही दोनों पांव से दिव्यांग हैं।


रबिनाथ की मां अम्बिका भगत ने बताया कि जब रबिनाथ 5 वर्ष का था, तब उसके पिता दुर्योधन भगत  गांव के सरकारी विद्यालय में उसका नामांकन कराने गये, लेकिन उस वक्त प्राध्यापक ने उसका नामांकन नहीं किया। आज रबिनाथ की उम्र 23 वर्ष है, लेकिन विद्यालय में दाखिला नहीं मिलने से वह इस उम्र तक भी निरक्षर ही है, जिसका उसे बहुत मलाल है। रबिलाल के मन में आज भी शिक्षा हासिल करने की ललक है।


यह बात भी सच है कि चाह से राह मिलती है। रबिलाल की पढ़ने की चाहत की खबर जब पूर्व जिला पार्षद करूणामय मंडल को मिली तब वह रबिलाल से मिलने उसके घर पहुंचे। करूणामय मंडल ने देखा, रबिलाल का बचपन बीत गया था, लेकिन पढ़ाई को लेकर उसकी इच्छा पर उम्र का असर नहीं था। जिसे देखते हुए पूर्व जिला पार्षद ने रबिलाल की शिक्षा को लेकर अधिकारी से बात की और उसकी स्थिति के बारे में बताया।


अधिकारी ने अविलंब रबिनाथ को विद्यालय में नामांकन का भरोसा दिलाया। यह सुनकर रबिनाथ के चेहरे की खुशी देखने लायक थी। आखिर अब रबिनाथ को दिव्यांग होने की वजह से शिक्षा से दूर नहीं रहना पड़ेगा।     


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