मौन सवाल

कोमल आज बहुत खुश थी, और हो भी क्यों न, एक छोटे से गाँव से निकलकर बड़े शहर की आबोहवा में जाने की व्याकुलता उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। साथ ही अपनों से बिछड़ने की कल्पना भी मन में मायूसी की जगह बना रही थी। शादी के दो साल पूरे होने वाले ही हैं। लगभग दो साल पहले अपने सहपाठी प्रदीप के साथ परिणय सूत्र में बँधी थी। प्रदीप वही लड़का है, जिसने कई बार उससे अपने प्रेम का इजहार किया और उसकी हठधर्मिता के कारण ही कोमल भी अधिक देर तक उसके प्रेमपाश से दूर नहीं रह सकी।


दोनों के परिवारोंको भी इनके मेल से आपत्ति नहीं थी, उनकी रजामंदी से ही कोमल और प्रदीप शादी के बंधन में बंध गये। शादी के बाद दोनों बहुत खुश थे। प्रदीप के माता-पिता भी बहुत अच्छे थे, वो कोमल को बहू नहीं बेटी समझते थे। इसलिये कोमल जल्दी ही ससुराल में रच-बस गई। वह सबका ख्याल रखती और बदले में उसे ढेरों प्यार मिलता।प्रदीप लम्बे समय से एक अच्छी नौकरी की तलाश में विभिन्न कम्पनियों में आवेदन कर रहा था, शादी के दो साल बाद ही सही उसे दिल्ली की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी मिली। खबर सुनकर घर में जैसे खुशी का ठिकाना नहीं था। कोमल अब पति के साथ वहीं जाने की तैयारी कर रही थी।


अंत में वो पल भी आया जब अश्रुपूरित आँखों से अपनों से विदा लिया। अपने और सबके ख्याल के वादे के साथ गोरखपुर से दिल्ली की ट्रेन पकड़ी। पति प्रदीप के साथ पहली बार कहीं बाहर सफर कर रही हूँ, ये सोचकर कोमल बहुत रोमांचित थी। तिरछी नजरों से प्रदीप का ओर देखा तो आप ही शरमा गई। प्रदीप एकटक उसे ही निहार रहा था। दरअसल प्रदीप शादी के बाद से ही कोमल के साथ कुछ पल अकेले गुजारने के सपने देखा करता था, गाँव में माता-पिता के सामने परम्परागत शर्म उसे कोमल से अपने प्रेम का इजहार करने से रोक लेती थी, मगर अब तो एक सुकून था, अपने सपनों की दुनियाँ में जाने का।


ख्यालों में कब रास्ता गुजर गया पता ही नहीं चला। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, बोर्ड देखकर दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। प्रदीप ने सामान उतारा टैक्सी पकड़कर दोनों मालवीयनगर आ गये। वहीं प्रदीप को कम्पनी ने रहने के लिये फ्लैट दिया था। दोनों खुश थे। बेहद खुश। घर में सब कुछ व्यवस्थित हो चुका था। रविवार छुट्टी का दिन था। सोमवार को प्रदीप के ऑफिस का पहला दिन था, अच्छा बीता मगर बीच-बीच में कोमल याद आती रही।


उधर कोमल बैठी रही। किसी तरह दिन बीतने लगे। प्रदीप धीरे-धीरे ऑफिस के काम में मशगूल रहने लगा और कोमल उसकी प्रतिक्षा में व्यस्त। कभी- कभी प्रदीप के ऑफिस से उसके सहकर्मी भी घर आते। उनमें कुछ पुरूष तो कुछ महिलाएँ भी होतीं। सभी खुले मिजाज के थे और खुशमिजाज भी। उनके जाने के बाद प्रदीप और कोमल उनकी बातें कर कब नींद की आगोश में चले जाते कुछ पता नहीं चलता।


नई नौकरी में प्रदीप बहुत व्यस्त था, मगर हफ्ते के आखिरी दिन मिली छुट्टी में प्रदीप कोमल को बाहर घुमाने ले जाता और दोनों अपनी एक हफ्ते की व्यस्तता को भूल जाते। इसी तरह वक्त निकलने लगा। कुछ समय बाद प्रदीप के बॉस कम्पनी के किसी डील को लेकर शहर से बाहर जा रहे थे। प्रदीप अपनी मेहनत एवं काम के प्रति लगन से उन्हें प्रभावित कर चुका था, इसलिये ऑफिस की सारी जिम्मेदारी प्रदीप को सौंपकर वो चले गये। ऑफिस में काम का बोझ बढ़ चुका था इसलिये प्रदीप देर तक रुकने लगा, कभीकभी छुट्टी वाले दिन भी।


कोमल हमेशा की तरह उसका इंतजार करती रहती। अक्सर देर होने पर प्रदीप उसे खाना खाकर सो जाने की बात कहता रहता था, क्योंकि वह अपने सहयोगियों के साथ ऑफिस से ही खाना खाकर आता। कोमल को प्रदीप के बगैर अच्छा नहीं लगता था मगर मजबूरी में वो किसी तरह थोड़ा बहुत खाकर सो जाती। यही रोज की दिनचर्या हो चली थी। के 6 दिन गुजार देती थी, अब वो भी नसीब नहीं हो रहा था।


धीरे-धीरे प्रदीप का साथ छूट रहा था और कोमल टूट रही थी। पति एक झलक देखे, उसके लिये दिन भर तैयार होकर बैठती मगर प्रदीप को फुर्सत कहाँ थी।अपने सहकर्मियों की हँसी, ठिठोली, उनका आकर्षण ही प्रदीप की बातों से झलकने लगा थी, जो कहीं न कहीं कोमल के मन में उनके लिये जलन की जगह घर कर रही थी। वह उदास रहने लगी, मगर प्रदीप को इसकी परवाह कहाँ थी। कोमल के मन में कई सवाल थे।


क्या इसी के लिये वह पति के साथ यहाँ आई थी? क्या बड़े शहर की आबोहवा में उसका पति कहीं गुम हो गया, या फिर वो छोटा सा गाँव ही अच्छा था, जहाँ बड़ों की सेवा से आशीर्वाद और पति का भरपूर प्यार जीवन का असीम सुख देता था? ये वो मौन सवाल थे जिनके जवाब देने की फुर्सत प्रदीप के पास नहीं थी।


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