भीड़ और इंसाफ


देश के अलग अलग हिस्से से एक समान सी घटना सामने आ रही है। नाम है मॉब लिंचिंग। भीड़ ने कभी गाय चुराने के आरोप में तो कभी राम का नाम नहीं लेने के आरोप में तो कहीं बच्चा चुराने के आरोप में या फिर किसी के आपसी झगड़े में अपना इंसाफ कर दिया। इन तरह तरह की खबरों से सोशल मीडिया के साथ मुख्य मीडिया अटी पड़ी रहती हैं।


संवेदनशील मन इन खबरों को पढ़कर और सुनकर आहत हो उठता है। अब इन घटनाओं की वजह से विभिन्न क्षेत्रों से प्रबुद्ध सवाल उठाने लगे हैं, कि आखिर इस सबके लिये सरकार कुछ क्यों नहीं कर रही है। क्यों नहीं इसके लिये कड़े कानून का प्रावधान किया जाता कि अपना फैसला सुनाने वाली इस भीड़ की हिम्मत टूट जाती। वह कानून का पालन करती। सच है कि लगातार घटती इन अमानवीय घटनाओं पर रोक के लिये किसी सख्त कानून की जरूरत है।


मगर क्या कानून बनाना ही काफी है। क्या इसके लिये हमारा मूक समाज दोषी नहीं है, जो हर गलत बात पर विरोधी सुर करने की बजाए अपनी मौन स्वीकृति दे देता है। नहीं तो किसी एक कोने की घटना पर दूसरे कोने के लोग आह भरकर केवल उसकी निंदा नहीं करते बल्कि उसे हद तक रोकने की कोशिश कर रहे होते। यूँ भी भीड़ का कोई मतलब नहीं होता, न उसकी जाति होती है और न धर्म। बस वह केवल एक ही तरफ मुड़ना जानती है जहाँ से शोर सुनाई देता है।


एक भड़कीली आवाज आती है, और सब उस तरफ दौड़ पड़ते हैं। उसमें न सही देखने की दृष्टि होती है, न समझने की शक्ति। वह शोर में तब तक गुम रहती है, जब तक वह शांत नहीं हो जाती। जी हाँ, मसान सी शांति नजर आने लगती है। बाहर का शोर अंदर आने लगता है, आखिर यह आजकल क्या हो गया है सबको.. इसमें कोई दो राय नहीं कि पहचान एक व्यक्ति की एक समूह की होती है, मगर भीड़ अनामि रहकर सबको विचलित ही करती है। इसलिये जरूरत है इस सभ्य समाज में हममें से कोई भीड़ का हिस्सा न बने।


यह बात भी सच है कि जिन मॉब लिंचिंग की खबरों की जानकारी हमें टीवी, अखबार और सोशल मीडिया के जरिये मिलती है, इनसे आम जिंदगी में भी पाला पड़ता है, लेकिन बहुत ध्यान नहीं देते। खबर तब बनती है, जब घटना बड़ी बनती है और किसी की जान चली जाती है।


कुछ महीने पूर्व अपने ही मोहल्ले में देखा एक शराबी को लोग पीट रहे थे। कोई हाथ से, कोई डंडे से तो कोई उस पर अपने जूते फेंकरहा था। यहां तक कि रास्ते से गुजरने वाले भी रूक कर उस शराबी पर अपना हाथ साफ कर रहे थे। किसी से पूछा कि उसे सब क्यों पीट रहे हैं, तो जवाब मिला- उसने किसी ट्यूशन जाती लड़की को नशे में कुछ अपशब्द कहे जिससे वह डर गई और उसकी जानकारी लोगों की दी।


फिर क्या था, उसे पकड़ लिया गया और इंसाफ करने में सब जुट गये। मैंने उसकी तरफ भीड़ में से झांककर देखा, बुरी तरह पिटाई से घायल हो रहा था, मैंने कहा- मत मारो उसे पुलिस को दे दो, वह उचित कार्रवाई करेगी, मगर भीड़ तैयार नहीं थी। समझाने पर उसे पुलिस को सौंप दिया गया। कमाल की बात तो यह थी कि दिन भर आवारागर्दी करने वाले लड़कों और रोज रात को शराब पीकर आने वालों ने भी उसकी पिटाई में जमकर हिस्सा लिया। उन्हें मतलब नहीं था कि किसके साथ क्या हुआ। बस वह अपना हाथ साफ करना चाहते थे।


किसी को लेकर आंतरिक संवेदना जैसे मर गई है। इस भीड़ को कानून का डर नहीं और सच्चाई से कोई वास्ता नहीं बल्कि अफवाहों से दो चार होती है। जहाँ तक अफवाह फैलाने की बात है तो सोशल मीडिया इसमें अव्वल है। यह एक नेटवर्किंग प्रक्रिया है, जो एक-दूसरे से आसानी से जुड़ी है। कई दबावों के बावजूद इन पर रोक लगाना मुश्किल साबित हो रहा है।


विकृत मानसिकता वाले फिर भी अपनी मंशा में सफल हो ही जाते हैं। मुख्य मीडिया की भी कई बार इन मामलों को भड़काने में गतिविधियां शामिल होती दिखती है, जब बार-बार ऐसी सनसनीखेज घटना को दर्शकों के सामने परोसा जाता है। उकसाया जाता है। टीआरपी इतना भी आवश्यक नहीं। जबकि मीडिया की महत्ता लोकतंत्र में अत्यधिक है। अगर वह चाहे तो अपनी विवेकशील विचारों, सकारात्मक लेखों एवं दंडात्मक प्रावधानों को सामने रखकर ऐसी उन्मादी भीड़ को बनने से रोक सकती है।


जिम्मेदारी केवल सरकार और प्रशासन की ही नहीं, बल्कि इस समाज में रह रहे हर व्यक्ति की है कि अपने आस-पास होने वाली घटनाओं को रोकने का भरसक प्रयत्न करे। देश के कानून का सम्मान हो। प्रत्येक नागरिक जागरूक रहकर वक्त रहते ऐसी घटनाओं को क्षेत्रीय प्रशासन तक पहुंचाए जिससे इन जघन्य घटनाओं पर अंकुश लग सके। जिंदगी अनमोल है और हमें इसकी कीमत समझनी होगी।


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