भारतीय चमड़ा उद्योग में निर्यात की भारी संभावना


भारत का विश्व में चमड़े के उत्पादन एवं जूते और चमड़े के उत्पाद में लगभग 13% हिस्सा है। चमड़ा और चमड़ा उत्पाद उद्योग भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 1% से कम का योगदान देता है और जूता उद्योग भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 2% योगदान देता है। भारतीय चमड़ा उद्योग में निर्यात की भारी संभावना है।  


दो दिन पूर्व कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री डॉ महेन्द्र नाथ पांडे ने चेन्नई में एक समारोह में बोलते हुए कहा, चमड़ा क्षेत्र एक निर्यात संचालित क्षेत्र है और अगले 5 वर्षों में इसमें 2 मिलियन रोजगार सृजित करने की क्षमता है। भारत सरकार ने हाल ही में 2019 के बजट में घोषणा की थी कि इस क्षेत्र में  कच्चे और अर्ध-तैयार चमड़े के लिए निर्यात शुल्क को तर्कसंगत बनाया जाएगा।


यह 2020 5.85 बिलियन अमरीकी डालर वर्तमान स्तर से से बढ़कर 9.0 बिलियन अमेरिकी तक पहुंच सकता है। भारत ने जापान, कोरिया, आसियान, चिली आदि के साथ व्यापार समझौते किए हैं, और यूरोपीय देशों, ऑस्ट्रेलिया आदि के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत कर रहा है।


महेन्द्र नाथ पांडे ने कहा, “फैशन और ट्रेन्ड का इस उद्योग पर बहुत प्रभाव है। पारंपरिक चमड़े के व्यापार और चमड़े के सामानों के अन्य वैकल्पिक रूपों के क्षेत्र में कई अवसर हैं। हमें निर्यात की व्यापक संभावनाओं के साथ बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करना होगा। इस अवसर पर, मैं लघु और मध्यम उद्यमों (एसएमई) और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को सलाह दूंगा कि वे उत्पादन की गुणवत्ता और कुशल पेशेवरों द्वारा अपव्यय में कमी के संदर्भ में अपनी विनिर्माण प्रक्रियाओं की समीक्षा करें।


मंत्री ने कहा कि मुझे “मोची स्वाभिमान पहल” की घोषणा करने में भी खुशी हो रही है, जो एक देशव्यापी गतिविधि है, जिसमें एलएसएससी सीएसआर फंडों के साथ चमड़ा आधारित सेवाएं प्रदान करने वाले मोची समुदाय को समर्थन देगा और कियोस्क के जरिए उन्हें बेहतर काम का माहौल देकर उनके कौशल का सम्मान करेगा। सरकार भी इस विचार का समर्थन करेगी और सुनिश्चित करेगी कि वे गरिमापूर्ण तरीके से अपना काम कर सकें।” 


 गौरतलब है कि भारत चमड़े के कपड़े और जूते का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है और इस अभूतपूर्व बाजार क्षमता के साथ, यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में सबसे ज्यादा संभावना वाला क्षेत्र लगता है। अतीत में भारत की चमड़े के शिल्प जैसे जूते और इससे संबंधित सामान में समृद्ध विरासत रही है। जो खासकर आगरा, कानपुर, अंबुर और अन्य क्षेत्रों के विभिन्न समूहों के उच्च कुशल कारीगरों द्वारा तैयार किए गए थे।


Popular posts from this blog

समय की मांग है कि जड़ से जुड़कर रहा जाय- भुमिहार महिला समाज।

जन वितरण के सामान को बाजार में बेचे जाने के विरोध में ग्रामीणों ने की राशन डीलर की शिकायत।

SAHAY के जरिये मिलेगी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के युवाओं को नई पहचान।