आजादी के जज्बातों को धार देने के लिये यहां संपर्क भाषा के रूप में हुआ हिंदी का प्रसार


भारत के सुदूर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी में अवस्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह है जहां अंग्रेजी शासन ने काला पानी के नाम पर अनेक क्रांतिकारियों का निर्वासन किया। ये क्रांतिकारी देश के अलग-अलग कोनों से आए थे और भिन्न- भिन्न भाषा बोलते थे।


आपसी संपर्क और आजादी के जज्बातों को धार देने के लिए उन्हें एक ऐसी भाषा की आवश्यकता थी, जिसे सभी लोग समझ- बोल सकते हों और इस प्रकार एक संपर्क भाषा के रूप में यहां हिंदी का तेजी से विकास हुआ। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लिखने के लिए अनेक लेखकों, संपादकों, कवियों आदि को अंडमान निर्वासित किया गया।


इन लोगों ने यहां हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक क्रांतिकारियों ने सेल्युलर जेल की दीवारों पर हिंदी में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। वीर सावरकर ने कारावास के दौरान यहां न सिर्फ अन्य क्रांतिकारी कैदियों को पढ़ाना आरंभ किया, बल्कि एक हिंदी वाचनालय भी शुरू किया।


सावरकर ने जेल की दीवारों पर ही 11 हजार पंक्तियों की अप्रतिम रचना कमला काव्य की रचना की। लेखनी के अभाव में उन्हें जेल की कोठरी की दीवारों पर कीलों और काटों से उत्कीणित कर कंठस्थ करने की चेष्टा भी की। प्रख्यात समाचार-पत्र स्वराज्य के संपादक होती लाल वर्मा, स्वराज्य के ही संपादक लद्दाराम, युगांतर के संपादक रामचरण लाल सहित तमाम लोगों ने यहां क्रांतिकारी साहित्य को प्रोत्साहित किया।


दरअसल, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में एक लघु भारत बसता है। यहां हर जाति, धर्म, भाषा व प्रांत के लोग मिलते हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में भले ही हिंदी का विरोध होता हो, पर यहा आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि के लोग भी जन-व्यवहार में हिंदी ही बोलते नजर आते हैं।


यहां अनेक प्रमुख संस्थाओं में भाषणों/वक्तव्यों के लिए हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया जाता है। हिंदी यहां की सर्वप्रमुख भाषा है। यहां तक कि निकोबारी और ग्रेट अंडमानी आदिवासी और कुछ हद तक जारवा आदिवासी भी भलीभांति हिंदी समझ-बोल लेते हैं। इसके अलावा यहां निकोबारी, तमिल, बांग्ला, मलयालम और तेलुगू भी बोली जाती है।


निश्चित रूप से एकता की भावना की यह धरोहर अनुपम और अनमोल है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में हिंदी सिर्फ भाषा/बोली के रूप में नहीं, बल्कि साहित्य के रूप में भी समृद्ध हो रही है। यहां हिंदी साहित्य की एक दीर्घजीवी परंपरा है, जो काला पानी के दिनों से आरंभ होकर नित्य प्रवाहमान है। अंडमान की धरती को सौभाग्य प्राप्त है कि काला पानी के ही बहाने तमाम प्रखर पत्रकारों, संपादकों, लेखकों, कवियों ने इस धरा पर सांस ली और कुछ-न-कुछ रचा।


पोर्ट ब्लेयर में स्थित स्टेट लाइब्रेरी में भी हिंदी एवं अन्य भाषाओं की पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएं पढने को मिलती हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन ने भी यहां हिंदी को समृद्ध किया है। आकाशवाणी पर अक्सर साहित्यिक गतिविधियों से लेकर चर्चा परिचर्चा तक होती रहती हैं। यहां लगभग सभी हिंदी चैनल देखे जा सकते हैं। फिल्म-थिएटर न होने के कारण हिंदी फिल्में टीवी चैनलों पर ही उपलब्ध हो पाती हैं।


निश्चित रूप से अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में हिंदी के विकास को लेकर अभी भी अनंत संभावनाएं हैं।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और 1998 से 2007 के बीच अंडमान की कई यात्राएं कर चुके हैं।)


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