त्रासदी की रात्रि से सुख के प्रभात तक


15 अगस्त 1947 हमारे लिये इतिहास का दुःख-सुखान्त मोड़ है। 14/15 अगस्त की आधी रात्रि जब हम दिल्ली में स्वतंत्र भारत के सपने को पूर्ण होता देख रहे थे, उसी समय भारत माँ खण्ड-खण्ड हो चुकी थी।  एक  कटकर पश्चिमी पाकिस्तान और दूसरा कटकर पूर्वी पाकिस्तान 'अब बंगलादेश' बन गया था। पश्चिमी और पूर्वी छोर लहूलुहान थे जो कल तक अपना आँगन था वहाँ आज विदेश बन गया है।


दिल्ली में रोशनी थी, लेकिन शेष देश में अंधेरा था। दिनकर जी ने लिखा ''सकल देश में हालाहल है दिल्ली में हाला है, दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अँधियारा है।" उस रात दिल्ली में रिमझिम बरसात हो रही थी शायद भारत माँ दर्द से कराहती हुई रो रही थी। महात्मा गाँधी 15 अगस्त को दिल्ली में नहीं थे, वे नौवाखाली (बंगाल) में थे। विभाजन के दर्द से कराहते भारतीयों के आँसू पोंछने की कोशिश कर रहे थे। देश में स्वतंत्रता का हर्ष और बंटवारे का रक्त रंजित विषाक्त एक साथ संवेदनाओं को झकझोर रहा था।


जो कल भारतीय थे, वे आज शरणार्थी बनकर शिविरों में भीग रहे थे। बड़े-बड़े महलों में रहने वाले सेठ आज भारत की गलियों में कम्बल बेच रहे थे जो कल प्रतिश्ठित नागरिक थे वे आज शरणार्थी बन गये थे। पूरे देश के नागरिकों में बँटवारे को लेकर, मानसिक अशान्ति फैली थी। इस विचलित मानसिकता की स्थिति में दिल्ली के लालकिले पर तिरंगा लहराया गया, देश में आजादी का उत्सव मना और हम लोग 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने के अभ्यस्त नागरिक बन गये।


 


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