आजादी के लिये एक जिले का संघर्ष


जंगे आजादी में लखीमपुर खीरी का बहुत योगदान रहा है बस फर्क सिर्फ इतना है कि आजादी से पूर्व जिला मुख्यालय लखीमपुर खीरी न होकर मोहम्मदी हुआ करता था। अंग्रेजों ने इस जनपद के पड़ोसी देश नेपाल से सटे होने के कारण सीमा से दूर मोहम्मदी को जिला मुख्यालय बनाया। सन 1857 में जंगे आजादी को लेकर हुए संघर्ष में शाहजहाँपुर का पतन और मोहम्मदी के मौलवी अहमदशाह की हत्या दोनों समाचार आजादी के योद्धाओं के लिए कष्टकारी थे।


उधर शाहजहाँपुर से मोहम्मदी आई सेना ने यहां का किला उखाड़ दिया और मोहम्मदी पर कब्जा कर जिला। वे मुख्यालय बनाकर यहीं से अपनी कार्य प्रणाली चलाते थे। जे0पी0 कालेज के पीछे खंडहर का रूप ले चुका किला आज भी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। बावजूद इसके यहां के लोगों ने साहस नही छोड़ा। लगभग एक वर्ष तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चुप बैठ कर अपनी रणनीति बनाते रहे।


इसी बीच 16 अक्टूबर 1858 को शाहजहांपुर के ब्रगेडियर कोलेनटूप बहुत भारी सेना लेकर मोहम्मदी की ओर बढ़े। इसी दिन की तलाश में समय साल भर शांत बैठे क्रान्तिकारियों ने सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया। इसी बीच अंग्रेज की एक सेना औरंगाबाद होते हुए मितौली पहुंच गई, पर वहां के राजा लोने सिंह ने अन्तिम सांस तक झण्डा अकेले फहराने का प्रण कर रखा था।


उन्होंने अपने मुटठी भर सिपाहियों के साथ अंग्रेजों का डटकर सामना किया और उस समय तक डटे रहे जब तक मितौली गढी की एक-एक ईंट अंग्रेजी तोपों से नहीं उड़ा दी गई। अन्त में नवम्वर 1858 मे मितौली के सूने खंडहर पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया ओर राजा लोने सिंह अपने सिपाहियों के साथ शहीद हो गये।


मितौली के पतन और मोहम्मदी पर कब्जे के बाद राजा लोने सिंह के राज्य को अंग्रेजों ने अपने चाटुकारों को बाँट दिया। इस प्रकार पूरे जिले में अंग्रेजी सत्ता छा चुकी थी, मगर धौरहरा के बहादुर राजा इन्द्रबिक्रम सिंह सीना ताने अंग्रेजों को चुनौती दे रहे थे। जांगडा वंशज के इस राजा को अन्त में उसके छोटे भाई सुरेंद्र बिक्रम सहित बंदी बना लिया गया और रियासत जब्त कर ली गई।


जिले के लोगों का आजादी के प्रति जुनून कम नहीं हुआ था सारी रियासतें जब्त होने के बाबजूद यहां के लोग आजादी के प्रति संघर्ष करते रहे धीरे-धीरे 19वीं सदी में भीखमपुर के शहीद राजनरायन की अगुआई में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की सेना आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर आजादी के लिए मर मिटने के लिए तैयार हो गये। बरबर के पं0 शान्ति स्वरूप सहित तमाम लोगों ने आजादी के प्रति अपनी लड़ाई जारी रखी। इस तरह जिले में पचासों में आजाद हिन्द फौज के सिपाही तैयार हो चुके थे, जिन्होंने देश के प्रति अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।


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