मुखर से उम्मीदें

अक्सर लोगों के मन में कई ऐसी बातें  होती हैं, जिन्हें जाहिर करने की कला उन्हें नहीं आती और मन की बात मन में ही रह जाती है, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो खुलकर अपनी बात लोगों के सामने रखते हैंऔर मुखर कहलाते हैं। कई सारी बातें दिल में रखने वाले शांत एवं गंभीर प्रवृति वाले होते हैं, जिन्हें समझने के लिये शायद इस बदलते वक्त में किसी के पास समय नहीं और प्रायः उनका मौन रहना चुभन पैदा करता है। वहीं दूसरी तरफ ऐसे व्यक्तित्व जो अपने दिल की सारी बात जाहिर कर देते हैं, उनकी अधिकतम बातें लोगों तक पहुँचती है और लोग उन्हें ज्यादा जानते और समझते हैं। ऐसे मुखर व्यक्ति उन तमाम लोगों की भी पसंद होते हैं, जो स्वयं करना तो बहुत कुछ चाहते हैं, मगर स्वभाववश कर नहीं पाते और ऐसे में उनकी बात रखने वाला कोई और मिल जाए तो फिर उस व्यक्ति की लोकप्रियता लाजिमी है।


एक लोकप्रिय व्यक्तित्व हर दिल, हर समुदाय और वर्ग का चहेता होता है, चाहे वह कितने ही विरोध से घिरा हो। बाधाएँ उसकी लोकप्रियता को कम नहीं कर सकतीं और ये सारी बातें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लागू होती हैं, जो अपने दूसरे कार्यकाल के लिये बड़े बहुमत के साथ सत्ता में आये हैं। अपने पिछले कार्यकाल में किये वादों के पूर्ण कार्यान्वयन नहीं किये जाने के आरोपों से घिरने के बावजूद उन्हें देश की जनता ने दोबारा सत्ता सौंपी है जो उनके मुखर व्यक्तित्व की लोकप्रियता को दर्शाता है। लोगों के मन के भावों को पढ़कर उन्हें व्यक्त करने की कला प्रधानमंत्री मोदी बखूबी जानते हैं, इसलिये तो इस बार जीत की लहर शहर से गाँव की तरफ नहीं बल्कि गाँव से शहर की ओर चली।


भारत जो गाँवों का देश है और जहाँ लगभग 70 से 80 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है, मोदी जैसे व्यक्तित्व वाले नेता को पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि उनके हालात पर ध्यान देने वाला, उन्हें विकास के रास्ते ले जाना वाला अगर कोई नेतृत्व है तो वह केवल मोदी हैं, दूसरा कोई विकल्प नहीं। अगर विकल्प होता तो शायद विचार संभव होता। इस बार की जीत पर प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा है, पिछली बार देश की जनता ने विकास के नाम पर उन्हें चुना था, मगर इस बार उन्हें समझकर चुना है।


लोगों की इस सोच ने इस लोकसभा चुनाव में बड़े-बड़े राजनीतिक विशेषज्ञों के विश्लेषणों को गलत साबित कर दिया। कयास, कयास ही रह गये और परिणाम ने सबको हतप्रभ कर दिया। सब कहते हैं, यह चुनाव परिणाम राष्ट्रवाद के नाम आया, जब पिछले कार्यकाल के अंत में पुलवामा हमले का बदला प्रधानमंत्री की अगुआई में पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक से लिया गया और कूटनीतिक दबाव देकर पायलट अभिनंदन को सकुशल भारत लाया गयाकहीं न कहीं यह बात सच भी है।


दरअसल लोग अपने देश के सपूतों को धोखे से मारने वालों पर बेहद नाराज थे और इसके लिये दोषी को सबक सिखाना चाहते थे। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा देशवासियों से यह वादा किया जाना कि इसका माकूल जवाब दिया जाएगा और उसके बाद त्वरित कार्रवाई से लोगों के दिल में मोदी मजबूती से घर कर गये। इस कार्रवाई ने मोदी के लिये बन रहे विदेशी प्रधानमंत्री की छवि को भी साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जो उन्हें ताने देते थे, अब उनके विदेश भ्रमण को मजबूत अन्तरराष्ट्रीय कूटनीति का जरूरी हिस्सा मानने लगे। इस मुखरता ने तो उन तमाम बीजेपी नेताओं और सांसदों के लिये भी दोबारा जीत के रास्ते साफ कर दिये जिनकी क्षेत्र में लोकप्रियता घटने लगी थी अथवा जिन्हें लोग नापसंद कर रहे थे।


मोदी को देश के नेता के रूप में चुनने की मजबूरी ने लोगों को उस क्षेत्रीय नेतृत्व को चुनने पर भी विवश कर दिया जिनसे नाराजगी थी। वह बस केन्द्र में एक स्थिर और मजबूत सरकार चाहते थे, जो वर्तमान में उन्हें मोदी ही दे सकते थे। यही वजह रही कि मोदी विशाल बहुमत से सत्ता में दोबारा आए। एक ओर यह जीत प्रधानमंत्री से लोगों की उम्मीद को व्यक्त करती है, तो दूसरी ओर अन्य नेतृत्व से नाउम्मीदी और निराशा जाहिर होती है। चाहे जरूरत हो या न हो मजबूत विकल्प की तलाश हमेशा होती है। एक मजबूत पेड़ की भी शाखाएँ वक्त के साथ खोखली होने लगती हैं। ऐसे में जरूरी है कि छाँव के लिये दूसरा मजबूत पेड़ भी मौजूद हो, जो तेज धूप और बारिश से बचा सके।


खासकर लोकतंत्र में कार्य के साथ आकलन भी होता रहे, इसके लिये मजबूत पक्ष के साथ विपक्ष आवश्यक है। फिलहाल जनता की तमाम उम्मीदें एक मुखर प्रधानमंत्री से हैं, जो कई नये-पुराने वादों के साथ दोबारा सत्ता में हैं, और जिन्होंने लोगों को विकास के रास्ते ले जाने का प्रण लिया है। जो इस बार सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नया नारा लेकर जनता के सामने हैंदेखना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी इस बार किस तरह लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं, क्योंकि इस बार गाँव के साथ शहर भी विकास देखने की चाह में है।


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