महाराजा इंद्रद्युम्न ने बनवाई थी  जगन्नाथपुरी की प्रतिमाएं


     महाराजा इंद्रद्युम्न सपरिवार उड़ीसा स्थित नीलांचल सागर के पास रहते थे। एक बार जगन्नाथ कृष्ण की अनुकंपा से उनकी इच्छा हुई कि जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमाएं निर्मित कराएं। वे सोचते रहे कि किस वस्तु से इन प्रतिमाओं का निर्माण हो। एक दिन उन्हें सागर के ऊपर एक विशाल काष्ठ खंड तैरता हुआ मिला। उन्होंने आंतरिक प्रेरणा से निश्चित किया, कि प्रतिमाएं इसी काष्ठ खंड से निर्मित होंगे।


     लेकिन पुनः चिंतित हो उठे कि इसके लिए उपयुक्त शिल्पी कहां मिलेगा। तब देव योग से देव शिल्पी विश्वकर्मा ने वृद्ध शिल्पी के रूप में उनके पास आकर कहा- मैं 21 दिनों में इन प्रतिमाओं का निर्माण करा दूंगा, लेकिन कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। वो काष्ठ खंड के साथ कमरे में बंद हो गये।


     राजा तो निश्चित प्रतिमाओं के निर्मित होने की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन रानी गुंडिचा का नारी मन सहज ही द्रवित हो गया। 15 दिन बीतते पर  रानी ने सोचा, इतने दिनों में तो वह शिल्पी खान- पान के अभाव में मृत्यु को प्राप्त हो गया होगा। उन्होंने कमरा खुलवा दिया। अंदर अपूर्ण प्रतिमाएं पड़ी थे, पर शिल्पी नहीं था। उसी समय आकाशवाणी हुई। हम इसी रूप में रहना चाहते हैं। आज भी जगन्नाथपुरी में वे प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं।


     महाभारत के अनुसार जब जगन्नाथ कृष्ण, भैया बलराम और बहन सुभद्रा के साथ मौसी के घर घूमने गए, तब लक्ष्मी रूपी रुक्मणी क्रोधित हुई, कि मुझे छोड़ बहन के साथ घूमने गए। क्रोधवश रुक्मणी ने वहां पहुंच कर रथ तोड़ दिया। जब इसकी सूचना जगन्नाथ कृष्ण को मिली तो उन्होंने देव शिल्पी विश्वकर्मा से रथ मरम्मत करवाए। आज भी कई स्थानों पर रथ तोड़ने की परंपरा है।


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