29 जुलाई 1891 को विद्यासागर ने ली अंतिम सांस


ईश्वर चंद्र बंधोपाध्याय का जन्म 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले के वीरसिंह गांव में एक अति निर्धन परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ठाकुर दास बंधोपाध्याय था। इन्होंने प्रायः प्रत्येक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। विद्यार्थी जीवन में इन्होंने अनेक विद्यार्थियों की सहायता की। 1841 में इन्हें सर्वप्रथम फोर्ट विलियम कॉलेज में मुख्य पंडित पद पर नियुक्ति मिली। यहीं ये विद्यासागर उपाधि से विभूषित हुए। उच्चतम सम्मान पाकर भी इन्हें वास्तविक सुख निर्धन सेवा में ही मिला। 


ये स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। इन्होंने सैकड़ों विद्यालय स्थापित किए। इनके जीवन साथी का नाम दिनामणि देवी था। इन्होंने अपने इकलौते पुत्र नारायण चंद्र बंधोपाध्याय का विवाह विधवा से किया। ईश्वर चंद्र अपना जीवन साधारण व्यक्ति के रूप में जीते थे लेकिन दान पुण्य राजा की तरह करते थे। इन्होंने 52 पुस्तकों की रचना की, जिनमें 17 संस्कृत में, 5 अंग्रेजी में और शेष बांग्ला में है। जिन पुस्तकों से इन्होंने विशेष साहित्यकीर्ति अर्जित की वे वैतालपंचविंशाति, शकुंतला और सीता वनवास है।


     बिहार का जामताड़ा जिला अब झारखंड में है। जामताड़ा के करमाटांड में विद्यासागर ने अपने जीवन के अंतिम 20 वर्ष संथाल आदिवासियों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इनके सम्मान में करमाटांड स्टेशन का नाम विद्यासागर रेलवे स्टेशन कर दिया गया है। इनके निवास स्थान के मूल रूप को अब भी व्यवस्थित रखा गया है। कोलकाता में 29 जुलाई 1891 को विद्यासागर ने अंतिम सांस ली।    


        उपरोक्त जानकारी पाठक मंच के साप्ताहिक कार्यक्रम इंद्रधनुष की 676वीं कड़ी में दी गई।


 


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