सफाई की राह पकड़ी तो पगला झाड़ू वाला के नाम से हुए मशहूर


साल 2014 में केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद जब 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्म दिवस को स्वच्छता दिवस के रूप में घोषित किया गया तो हर तरफ नेताओं द्वारा इसका खूब प्रचार प्रसार किया गया। सबके हाथ में झाड़ू थे, जो लोगों को अपना आस-पास साफ रखने की नसीहत दे रहे थे। इसकी शुरूआत सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की। और फिर क्या था, हर स्तर पर यह अभियान प्रचारित हो चला था। निगमों में अपना क्षेत्र सबसे साफ-सुथरा दिखाने की होड़ लगने लगी। नियमित रूप से कूड़े उठाने वाली गाड़ियाँ गलियों में घूमने लगी तो जगह-जगह शौचालय बनने लगे। गंदगी काफी हद तक दूर होने लगी, क्योंकि लोगों की मानसिकता बदल रही थी। यह एक बड़ा अभियान था, जिसके प्रचार के लिये बड़ी रकम भी लगाई गई, इसलिये इसका व्यापक असर रहा। मगर कहते हैं न कि अच्छी सोच कभी भी कहीं भी और किसी के जेहन में पैदा हो सकती है। देशव्यापी स्वच्छता अभियान का संकल्प भले ही 2014 में नव निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिया हो, लेकिन इस कार्य को करने का अलख एक दिल में पहले ही जल रहा था। न उसके पास संसाधन थे और न ही लोगों का साथ, मगर लोगों की गंदगी को साफ करने और उन्हें सफाई के फायदे बताने वाले शशिभूषण सिंह के जोश में कभी कमी नहीं आई।


शुरूआती दिनों में पगला झाड़ूवाला के नाम से विख्यात शशिभूषण बिहार के सीतामढ़ी जिला स्थित डुमरी कला गाँव में साल 2011 से ही अपने स्तर पर गाँव में स्वच्छता अभियान चला रहे हैं। इस अभियान को चलाने में शशिभूषण सिंह को शुरू में काफी मशक्कत करनी पड़ी। इस अभियान पर लोग नाक-भौं, सिकोड़ते, ताने मारते रहे लेकिन शशिभूषण सिंह हार कहाँ मानने वाले थे। अपने पैसे से झाड़ू टोकरी खरीदा, जहाँ कहीं गंदगी देखते हैं, किसी से बिना कुछ कहे सफाई करते हैं। इस सफाई अभियान को सफल बनाने के लिये शशिभूषण ने लोगों को खुले में शौच के लिये भी मना किया। सफाई का यह काम वह इतने मन से और निस्वार्थ भआवना से करते हैं, कि लोग उन्हें पगला झाड़ू वाला के नाम से पुकारने लगे।



शशिभूषण की सुनें तो आस-पास सफाई रखने की भावना उनके मन में तब जागृत हुई जब वह पढ़ाई के दौरान गली मोहल्ले में गंदगी बिखरा देखते थे। इसी दौरान गांव के अति पिछड़े मोहल्ले में बीमारी फैलने से कई लोगों की मौत हो गई। यही वो वक्त था, जब शशिभूषण सिंह ने गंदगी से होने वाली बीमारी से निबटने के लिये स्वच्छता का संकल्प ले लिया। शशिभूषण की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लेकिन स्वच्छ रखने की सोच के पीछे उन्होंने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। उनकी पत्नी ने भी इस मुहीम में जरूरत के सामान के लिये पति का साथ देते हुए अपने जेवर बेच दिये।


आज शशिभूषण का नाम क्षेत्र के साथ-साथ जिले में मशहूर है। उन्हें जिलाधिकारी द्वारा सम्मान भी मिला है। लोगों के प्यार और स्नेह से साल 2015 में वे पंचायत चुनाव में वार्ड सदस्य के रूप में चुने गये।


शशिभूषण के प्रयासों से आज पूरे डुमरी कलां के निवासियों को उनपर नाज है, लेकिन शशिभूषण के सामने परेशानियाँ भी बहुत हैं। कार्यक्षेत्र बढ़ गया है, और पैसे पर्याप्त नहीं है।


उनके पास अच्छी सोच तो है, लेकिन जीविकोपार्जन के लिये कोई माध्यम नहीं है। कहीं से मदद मिल जाती है लेकिन उससे गुजारा मुश्किल है। फिर भी शशिभूषण अपने काम में लगे हैं, और उम्मीद करते हैं, कि आर्थिक तंगी उनकी इस सोच के आड़े नहीं आएगी।


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