गर्मी से हो रहे बेहाल, तो क्यूँ न घूमें - झीलों का शहर नैनीताल ?

गर्मी के शुरू होते ही हमारे देश में खासकर शहरी वर्ग के लोगों में गर्मी के दिनों में किसी ठंडे जगह पर जाकर घूमने-फिरने की प्रवृति दिनों दिन बढ़ती जा रही है। उसके दो प्रमुख कारण है एक तो कुछ दिनों के लिये गर्मी से निजात मिल जाती है तथा दूसरा इस समय बच्चों के स्कूल में भी लंबी छुट्टी रहती है, जिसके कारण पर्यटक प्रकृति का आनंद उठाने के लिए ठंडे जगहों पर जाना पसंद करते हैं। 



वैसे तो हमारे देश में बहुत सी ऐसी जगह है जहां पर गर्मी के दिनों में घूमने के लिए जाया जा सकता है, लेकिन यहां हम झीलो व तालों के शहर नैनीताल की चर्चा करने जा रहे हैं जिसके बारे में पढ़कर आपका भी मन एक बार अवश्य इस जगह घूमने के लिए लालायित हो जाएगा।


नैनीताल एक संक्षिप्त परिचय


नैनीताल भारत के उत्तराखंड राज्य का एक प्रमुख पर्यटन नगर है। यह नैनीताल जिले का मुख्यालय भी है। उत्तराखंड को भौगोलिक दृष्टिकोण से दो भागों में बांटा जा सकता है- एक कुमाऊं, दूसरा गढ़वाल। नैनीताल कुमाऊं क्षेत्र में पड़ता है, जहां इस जिले का विशेष महत्व है। देश के प्रमुख क्षेत्रों में नैनीताल की गणना होती है। यह छखाता परगने में आता है। छखाता नाम शष्टिखात से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है साठ तालों में से एक। इस अंचल में पहले साठ मनोरम प्राकृतिक ताल थे। इसीलिये इस क्षेत्र को शष्टिखात कहा जाता था। इसे भारत का लेक डिस्ट्रिक्ट कहा जाता है, क्योंकि यह पूरी तरह झीलों से घिरा है।


नैनी शब्द का अर्थ है आंखें और ताल का मतलब है झील। झीलों का शहर नैनीताल उत्तराखंड का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच में बसा यह स्थान झीलों से घिरा हुआ है। इनमें से सबसे प्रमुख झील नैनी झील है जिसके नाम पर इस जगह का नाम नैनीताल पड़ा है। नैनीताल को जिधर से देखा जाए, यह बेहद खूबसूरत दिखता है। नैनीताल के ताल के दोनों ओर सड़के है। ताल का मल्ला भाग मल्लीताल तथा नीचला भाग तल्लीताल कहलाता है। संध्या समय तल्लीताल से मल्लीताल को आने वाले सैलानियों का तांता सा लग जाता है। इसी तरह मल्लीताल से तल्लीताल (माल रोड) जाने वाले प्रकृति प्रेमियों का काफिला देखने लायक होता है। नैनीताल पर्यटको, सैलानियों, पर्वतारोहियों का चहेता नगर है जिसे देखने प्रतिवर्ष हजारों-लाखों की संख्या में लोग यहां आते हैं।


कुछ ऐसे भी धार्मिक श्रद्धालु यात्री होते हैं जो केवल नैनीताल में नैना देवी के दर्शन करने और देवी मां का आशीर्वाद प्राप्त करने की अभिलाषा से यहां पर आते हैं। यह देवी कोई और नहीं स्वयं शिव पत्नी नंदा (पार्वती) हैं। यह तलाब उन्हीं की स्मृति का द्योतक है।



नैनीताल की खोज


सन् 1839 ई. में एक अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन हुआ करता था। वह रोजा, जिला शाहजहांपुर उ0प्र0 में चीनी का व्यापार करता था। इस पी. बैरन नाम के अंग्रेज को पर्वतीय अंचल में घूमने का अत्यन्त शौक था। केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा करने के बाद यह उत्साही अंग्रेज युवक कुमाऊं की मखमली धरती की ओर बढ़ता चला गया। एक बार खैरना नाम के स्थान पर यह अंग्रेज युवक अपने मित्र कैप्टन टेलर के साथ ठहरा हुआ था। प्राकृतिक दृश्यों को देखने का इन्हें बहुत शौक था। उन्होनें एक स्थानीय व्यक्ति से जब शेर का डाण्डा इलाके की जानकारी प्राप्त की तो उन्हें बताया गया कि सामने जो पर्वत है, उसको ही शेर का डाण्डा कहते हैं और वहीं पर्वत की पीछे एक सुन्दर ताल भी है। बैरन ने उस व्यक्ति से ताल तक पहुंचने का रास्ता पूछा, परन्तु घनघोर जंगल होने के कारण तथा जंगली पशुओं के डर की वजह से वह व्यक्ति तैयार नहीं हुआ। परन्तु निडर पर्वतारोही बैरन पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे। गांव के कुछ लोगों की सहायता से पी. बैरन ने शेर का डाण्डा (2360 मी.) को पार कर नैनीताल की झील तक पहुंचने का सफल प्रयास किया। इस क्षेत्र में पहुंचकर और वहां की सुन्दरता देखकर पी. बैरन मंत्रमुग्ध हो गये तथा उन्होनें उसी दिन तय कर लिया कि वे अब रोजा, शाहजहांपुर की गर्मी को छोड़कर नैनीताल की इन वादियों को ही आबाद करेंगे।


पी. बैरन नैनीताल के इस अंचल के सौन्दर्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होनें सारे इलाके को खरीदने तक का निर्णय कर लिया। फलस्वरूप इतनी सुंदर जगह नैनीताल को खोजने का श्रेय इसी अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन की जाता है।


उत्तराखंड की सर्वोत्तम झील नैनीताल झील है। यह 1500 मीटर लम्बी, 510 मीटर चौड़ी तथा 30 मीटर गहरी है।यह झील अपने नैसर्गिक सौदर्य के लिए लाखों पर्यटकों को बार-बार आने के लिए आमंत्रित करती है। सात पहाड़ियों से घिरी झील के संदर्भ में एक पौराणिक गाथा है कि झील का निर्माण पुलस्य और पुलह ऋषियों द्वारा किया गया था। नैनीताल अथवा नयनताल के में कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में जब अपने पति शिव का अपमान न सहने के कारण सती ने अग्निदाह कर लिया तो क्रोधित शिव सती के शव को कंधे पर उठाकर तांडव नृत्य करने लगे। सती के शरीर के 51 टुकड़े जहां-जहां गिरे वहां-वहां एक-एक शक्तिपीठ स्थापित हुआ। इस स्थान पर सती की आंखें गिरी, वहीं नयनताल या नैनीताल स्थित है। नैनीताल सात पहाड़ियों से घिरा है- आयरपात, दवे पात, हाड़ीवादीचीना पीक, आलम, लरिया कांटा और शेर डंडा। चीना पीक से पूरा नैनीताल दिखाई देता है। यह 8568 फुट ऊंची है।


वैसे तो नैनीताल में नैनी झील प्रमुख रुप से दर्शनीय है लेकिन कुछ अन्य निकटवर्ती पर्यटन स्थल भी है जहां नैनीताल के साथ-साथ जाया जा सकता है जिनमें प्रमुख है- हनुमानगढ़ी, काठगोदाम, भवाली, नौकुचियाताल, सात ताल, भीमताल, नल- दमयन्ति ताल, रामगढ़, मुक्तेश्वर, खुर्पाताल, काशीपुर, द्रोणा सागर, गिरीताल इत्यादि।



नैना देवी का ऐतिहासिक महत्व


नैनी झील के उत्तरी किनारे पर नैना देवी का मंदिर स्थित है। 1880 में भू-स्खलन से यह मंदिर नष्ट हो गया था। बाद में इसे दुबारा बनाया गया। यहां सती यानि पार्वती के शक्ति रूप की पूजा की जाती है। मंदिर में दो नेत्र है जो नैना देवी को दर्शाते हैं। शिव और पार्वती से संबंधित घटनाओं का वर्णन हम लेख में उपर कर चुके हैं। यहां विस्तार से वर्णन किया जा रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। अवघरदान शिव को दक्ष प्रजापति पसंद नहीं करते थे, परन्तु वे देवताओं के अग्रह को टाल नहीं सकते थे, इसलिये उन्होनें अपनी पुत्री का विवाह न चाहते हुये भी शिव के साथ कर दिया था। एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहां यज्ञ में बुलाया, परंतु अपने दामाद शिव और बेटी पार्वर्ती को निमंत्रण तक नहीं दिया।


उमा शिव से हठ करके इस यज्ञ में पहुंची। जब उसने अपने मायके में अपने पिता के यज्ञ में सभी देवताओं का सम्मान तथा अपना व अपने पति का निरादर होते हुये देखा तो वो अत्यंत दुखी हो गयी। यज्ञ के हवनकुण्ड में यह कहते हुये कूद पड़ी कि मैं अगले जन्म में भी शिव को ही अपना पति बनाऊंगी। आपने मेरा व मेरे पति का जो निरादर किया इसके प्रतिफल-स्वरुप यज्ञ के हवन कुण्ड में स्वयं जलकर आपके यज्ञ को असफल करती हूं। जब शिव को यह बात ज्ञात हुआ कि उमा सती हो गयी है तो उनका क्रोध फूट पड़ा। उन्होनें अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला।सभी देवी-देवता शिव के इस रौद्र रुप को देखकर सोच में पड़ गये कहीं शिव सारे संसार को नष्ट कर प्रलय न कर डालें।


इसलिये सारे देवी-देवताओं ने देवों के देव महादेव से प्रार्थना की और उनके क्रोध को शान्त किया। दक्ष प्रजापति ने भी क्षमा मांगी। शिव ने उनको भी आशीर्वाद दिया। परन्तु सती के जले हुये शरीर को देखकर उनका वैराग्य उमड़ पड़ा। उन्होनें सती के जले हुए शरीर को कंधे पर डालकर आकाश भ्रमण करना शुरु कर दिया। ऐसी स्थिति में जहां-जहां पर उमा के शरीर के अंग गिरे वहां-वहां पर शक्ति पीठ हो गये। जहां पर सती ने नयन (आँख) गिरे थे, वहीं पर नैना देवी के रुप में उमा अर्थात् नन्दा देवी का भव्य स्थान हो गया। आज का नैनीताल वही स्थान है, जहां पर उमा देवी के नैन गिरे थे। कहा जाता है कि नयनों के अशुधार ने यहां पर ताल का रुप ले लिया। तब से निरंतर यहां पर शिव पत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा नैना देवी के रुप में होती है।


कैसे पहुँचें नैनीताल


वस्तुतः गर्मी के दिनों में घूमने वालों के लिए नैनीताल भारत में स्थित अन्य स्थलों में सर्वाधिक उपयुक्त है। यहां पर जाने के लिए वायु मार्ग से अगर जाते हैं तो निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर हैजो नैनीताल से लगभग 70 कि0मी0 की दूरी पर है। यहां से दिल्ली के लिए नियमित उड़ाने हैं। रेल मार्ग से जाने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, जहां से नैनीताल की दूरी मात्र 35 कि.मी. है। सड़क मार्ग से जाने वाले यात्रियों के लिए - नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग 87 से जुड़ा हुआ है। दिल्ली, आगरा, देहरादून, हरिद्वार, लखनऊ, कानपुर और बरेली से रोडवेज की बसें नियमित रूप से यहां चलती है। जून-जुलाई जैसे महीने में भी जब संपूर्ण भारत वर्ष लू के थपेड़ों से झुलसता होता है, नैनीताल का अधिकतम तापमान 20-22 डिग्री सेल्सियस ही रहता है। अर्थात इस मौसम में भी वहां पर जाकर गर्मी से बहुत राहत मिलती है


 


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