नजरिये से बदलेगी ज़िन्दगी


बचपन में दुनिया के शुरू होने की कहानी सुनी थी, पहले किरदार आदम और ईव की। दो इंसान जिनमें एक महिला तो दूसरा पुरुष। इन दोनों से दुनिया आगे बढ़ी और अब न जाने कितने आदम और ईव हैं। बचपन में सुनी बातें धुंधली ही सही मगर आजीवन याद रहती हैं, इसलिये इस परिपेक्ष्य में जिक्र कर दिया। खैर, दुनिया के शुरुआत के पीछे दो इंसानों की कहानी कहने का तात्पर्य यह है कि दो इंसान महिला और पुरुष थे, लेकिन कालांतर में एक को अधिकाशतः देह के रूप में देखा जाने लगा। यह देह कोई और नहीं बल्कि महिला है।


जी हाँ। आज सामान्यतः हर कोने में महिला को देहरूपी वस्तु समझकर ही देखा जाता है। एक नन्हीं बच्ची जन्म के बाद से ही कई नजरों में आने लगती है। माता-पिता डर-डरकर अपनी बच्ची को पालते हैं। उसे स्कूल भेजने से पहले लड़कों की तुलना में ज्यादा सशंकित होते हैं। उसके कपड़ों पर नजर घर से निकलते ही पड़ोसियों, रिश्तेदारों एवं हर मिलने वालों की होती है कि देह तो नहीं दिख रही और अगर दिख भी रही है तो माता-पिता अवश्य गुनहगार हैं। अगर ऐसी दिखी तो उसके साथ कुछ भी हो सकता हैकिसी ने उसके साथ बुरा कर दिया तो गुनहगार का तमगा लड़की और उसके माता-पिता को आराम से दे दिया जाता है, यह कहकर कि ढंग से रहती नहीं थी या फिर समय रहते माँ-बाप ने टोका नहीं। लेकिन असल में गुनहगार का गुनाह थोड़ा कम कर दिया जाता है, यह कहते हुए कि उसने गलती तो की, मगर लड़की को इतना बिंदास नहीं होना चाहिये था। आखिर मर्यादा भी कोई चीज है।


सवाल यह है कि यह मर्यादा केवल लड़की के लिये ही क्यों, लड़के के लिये क्यों नहीं होती। कोई लड़का बनियान और हाफ पैंट में घूम रहा हो, हँसी मजाक कर रहा हो तब लड़की उसे केवल देह क्यों नहीं समझ सकती, क्योंकि लड़का देह नहीं इंसान है। उसे उसकी मर्जी के बगैर छूना मंजूर नहीं। वह रात के अंधेरे में भी कहीं बेधड़क आ-जा सकता है, क्योंकि उस पर किसी महिला की बुरी नजर नहीं पड़ती। जन्म लेने के बाद बचपन से ही उसे हर रूप के लिये आजादी है। क्योंकि महिला की नजर बुरी नहीं है। उसने पुरुषों को इंसान समझा है और वह उसे इंसानों की तरह ही देखती है। इसलिये इस समाज में पुरुष सुरक्षित हैं।


आज समाज में हम महिलाओं की लाख पैरोकारी करें, उसे मुद्दा बनाएँ, मगर उसे इंसान समझ लें, उसके अस्तित्व के लिये यही काफी है। बचपन से देह को लेकर बढ़ती महिला कार्यस्थल पर हो या फिर घर में, इसी रूप में जानी जाती है। कार्यस्थल पर अगर कोई महिला आगे बढ़ती है, तब भी औरों की नजर में उसकी काबिलियत नहीं बल्कि उसका महिला यानि देह होना मायने रखता है और यह कई बार सच्चाई भी होती है कि अगर वह चाहे तो आगे बढ़ जाये या फिर अपने कदम पीछे खींच ले, चुनाव महिला को करना पड़ता है। यह और बात है कि उसके लिये चयन नहीं बल्कि खुद को देह और इंसान समझने की परीक्षा होती है। इसी तरह घर की महिला का यौवन जब ढलने लगता है, तब उसकी तरजीह भी कम होने लगती है। पहले का बेपनाह प्यार नजरअंदाज में बदलने लगता है। सब देह की माया है। देह से इंसान बनाने का फासला न जाने कितनी जागरूकताओं के बाद तय होगा कहना मुश्किल है, मगर यह हम सबकी जिम्मेदारी इंसान कहना ही नहीं समझना भी जरूरी है।


दरअसल, महिला एक किरदार है, जिसे रचयिता ने खुद एक रचना के लिये चुना है। उसमें वह सारी भावनाएँ हैं, जिसे व्यक्त करने का उसे अधिकार है। देहरूपी वस्तु समझकर उसका इस्तेमाल करना, उसे कमजोर साबित करना, भोजन समझना आदि एक कुत्सित सोच है जो एक पुरुष (इंसान) दूसरी महिला (इंसान) के लिये कभी नहीं सोच सकता। पुरुष भी उसे वही आजाद, सुरक्षित जीने का माहौल दे जो महिला ने उसे दिया है। बेशक इस नजरिये से दुनिया बदल जाएगी और महिला देह से इंसान बन जाएगी। यहाँ ये कहना बेहद जरूरी है कि अपवाद आज भी कहीं न कहीं हैं, जिसे अपनाकर एक नई शुरुआत करते हुए कदम आगे बढ़ाया जाए तो दुनिया सचमुच आदम और ईव की तरह बेहद खूबसूरत होगी।


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