काम का दबाव बिगाड़ रहा महिलाओं का स्वास्थ्य

 



समयांतराल पर हुए सर्वेक्षणों से यह पता चलता है कि कामकाजी महिलाएँ  स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझती रहती हैं। भारत की लगभग तीन चौथाई महिलाएँ ऐसी स्थिति का सामना कर रही हैं। देश के विभिन्न विभागों में कार्यरत महिलाएँ अक्सर घर और ऑफिस की जिम्मेदारियों से परेशान रहती हैं जिसकी वजह से उनमें कई बीमारियाँ घर कर जाती हैं। देश में प्रत्येक चार में से तीन नौकरीपेशा महिलाओं का स्वास्थ्य घर- दफ्तर की भाग दौड और उनके बीच संतुलन साधने में कहीं न कहीं कमजोर पड़ जाता है। घर और बच्चों की देखभाल के साथ ऑफिस के काम की वजह से बने दबाव के चलते उनकी दिनचर्या काफी बदल जाती है और गंभीर बीमारियां उन्हें घेर लेती हैं।


 लगभग 32 से 58 साल की आयु की महिलाएँ अधिक प्रभावित


ऐसा देखा गया है कि लगभग 32 से 58 साल की आयु के बीच की तीन चौथाई कामकाजी महिलाओं में मोटापा, थकान, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, पीठ दर्द और उच्च कोलेस्ट्रोल जैसी बीमारियां अपनी जगह बना लेती हैं। कम उम्र में नौकरी की शुरूआत करने वाली लड़कियां जब उम्र के कई बसंत तय कर रही होती हैं तब वो भी धीरे- धीरे इन बीमारियों की चपेट में आने लगती हैं। शुरू में वो परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम होतीं हैं। भारतीय कामकाजी महिलाओं को जहा एक तरफ घर--दफ्तर और परिवार की जिम्मेदारियों से जूझना पड़ता है वहीं कार्यालयों में कामकाज के बढ़ते घंटे, तय समय सीमा के भीतर काम पूरा करने और ज्यादा काम का दबाव उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। महिलाओं को इस सबके अलावा कार्यालय जाने में सार्वजनिक परिवहन की दिक्कत और सुरक्षा का खतरा भी परेशान किये रहता है।


बदलते परिवेश में महिलाएँ भी पुरूषों की तुलना में वो सारे काम करने का हौसला रखती हैं, जो पुरूष कर सकते हैं। हर क्षेत्र में वो आगे बढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। वो भी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं। किसी पर निर्भर रहने की बजाय वह आत्मनिर्भर बनकर अपना जीवन यापन करना चाहती हैं और यही वजह है कि वर्तमान में वर्किंग वुमैन की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। हालांकि परंपरागत और रूढ़िवादी कहे जाने वाले भारतीय समाज में कामकाजी महिलाओं की संख्या में वृद्धि होना एक सुखद लक्षण है लेकिन इसका एक परेशान कर देने वाला पहलू यह भी है कि आज महिलाओं को घर के साथ-साथ बाहर की जिम्मेदारियां भी उतनी ही दक्षता से संभालनी पड़ रही है क्योंकि इतने समय परिवर्तन के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है।


 काम का अधिक बोझ कर रहा बीमार


काम का अत्यधिक बोझ जीवन जीने का तरीका तथा अन्य कारणों से कामकाजी महिलाओं को कई तरह की बीमारी हो रही है। अधिकतर कामकाजी महिलाएं अवसाद, पीठ में दर्द, मधुमेह, हायपरटेंशन, उच्च कोलेस्ट्रोल, हृदय एवं किडनी की बीमारियों से ग्रस्त हैं। 42 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं लाइफ स्टाइल की बीमारियों जैसे पीठ में दर्द, अवसाद, मधुमेह, हायपरटेंशन एवं हृदय रोग की से ग्रस्त हैं। कुछ कामकाजी महिलाएँ क्रोनिक बीमारियों से ग्रस्त हैं। कामकाजी महिलाएं घर एवं कार्यालय की जिम्मेदारियों को निभाने में संतुलन बनाए रखती हैं लेकिन निर्धारित समय में काम पूरा करने के लक्ष्य के कारण ज्यादा देर तक काम करने से उन्हें मुश्किल का सामना करना पड़ता है। सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी महिलाओं को परेशान करती हैं।


कार्यालय में जरूरी काम पूरा करने के बाद उन्हें घर के कामों को भी बखूबी करना होता है। इससे उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। अधिकतर महिलाएं बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर के पास नहीं जाती। इसका मुख्य कारण समय नहीं मिलना है। कुछ तो घर में ही इलाज करती हैं। इलाज का खर्च बढ़ना भी समस्या है। विशेषकर कम वेतन पाने वाली महिलाओं के लिए यह ज्यादा बड़ी समस्या है। कामकाजी महिलाओं में आत्मविश्वास होता है, लेकिन कोई गलती होने से उन्हें आत्मग्लानि भी होने लगती है। ऐसी स्थिति उन्हें तनावग्रस्त कर देती है। यही तनाव आगे चलकर कई बीमारियों का कारण बन जाता है। महिलाएं ऐसी समस्याओं का शिकार नहीं हों, इसके लिए घर के सभी सदस्यों को मिलकर काम करने की जरूरत है। उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना सब की जिम्मेदारी है।


आहार का ख्याल है जरूरी


यह जरूरी है कि महिलाएं थोड़ा आराम करने के साथ-साथ अपने खाने-पीने का भी ख्याल रखें। आहार बुद्धिमानी से चुनें, जो उन्हें हमेशा चुस्त और तंदरुस्त रहने में मदद करे।


पुरुषों की ही तरह महिलाओं की भी रोजाना की दैनिक पोषण संबंधी आवश्यकताएं होती हैं। खाने की जरूरत हर व्यक्ति की उम्र और सेहत के हिसाब से अलग-अलग रहती है। आहार का चयन करते समय अपने शरीर की जरूरत को समझना चाहिए। इनके अलावा कुछ आहार ऐसे भी हैं, जो सभी के लिए प्रायः अनिवार्य ही होते हैं। उदाहरण के तौर पर सभी को रोजाना फल एवं सब्जी का सेवन करना चाहिए। साबुत अनाज और दाल को भी भोजन में शामिल करना चाहिए। खाने में वसा का कम सेवन करें और कम चीनी वाले उत्पाद लें।


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