हिन्दी नई चाल में ढली


 कंगन चूड़ी, साड़ी उतार,


ओढ़ चली स्टॉल संवार,


दिखती थी कैसे गुलाब की कली,


देखो हिन्दी नई चाल में ढली।


नई उमंगों से खोल श्वास द्वार,


अंग्रेजी को अपनाकर दिया विस्तार ।


हिन्दी को Hindi लिख मनचली,


देखो हिन्दी नई चाल में ढली।


Main tumse karti hun pyar,


हिन्दी का यह अवतार, बेकरार।


एक बहव्यात्मक मुस्कान ले छली,


देखो हिन्दी नई चाल में ढली।


मृगनयनी जैसे नयन से मारती थी बाण,


जब कवियों के लेखन से चलती थी कटार।


आज वह हम सबको नई दिशा दे चली,


देखो हिन्दी नई चाल में ढली।


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