वन से है हम सबका अस्तित्व


वनों का सृजन, प्रबंधन, उपयोग एवं संरक्षण की विधा को वानिकी कहा जाता है और वनों के संरक्षण के लिए ही दुनियाभर में 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाया जाता है। देखा जाए तो, वानिकी के सिमटने का मुख्य कारण है जनसंख्या वृद्धि। आबादी को आवास, भोजन के साथ तमाम बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती है। भोजन एवं अन्य चीजों की जरूरत के लिए उद्योगों में बेतहाशक वृद्धि हो रही है और उद्योग के लिए जमीन सहित सभी संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। विकास के नाम पर पर्यावरण को अंधाधुंध क्षति पहुंचायी जा रही हैदेखा जाए तो उद्योग-धंधों मकानों का निर्माण अनाज उत्पादन करने एवं लकड़ियों की बढ़ती मांग जैसे मुख्य कारक ही वनों के नुकसान का प्रमुख कारक हैं।


हर मौसम में मानव जगत को खुद को 5 ढालना पड़ता है, जिससे कि मौसम के बदलाव का उसपर कोई असर न हो। लेकिन कुछ वर्षों से मौसम का मिजाज इस तरह बदल रहा है कि मानव को पता ही नहीं चल रहा कि गर्मी में ठंड का अहसास, ठंड में गर्मी का अहसास तो कभी बिन बादल बरसात क्यों हो रही है। मौसम के बदलते मिजाज ने लोगों को असमंजस में डाल दिया है। मौसम के बदलते मिजाज का प्रमुख कारण है ग्लोबल वॉर्मिंग।


विशेषज्ञों के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग ने मौसम को और भी मारक बना दिया है, और आने वाले वर्षों में मौसम में अहम बदलाव होने की पूरी संभावना है। ऐसा इसलिये कि मानवीय आकाक्षाओं ने प्रकृति के साथ अत्यधिक ज्यादती की है, और प्रतिक्रिया के तौर पर प्रकृति बदला ले रही है। ऐसे में हमें अपने अस्तित्व के बारे में सचेत होना होगा, और उनकी रक्षा करनी होगी जो हमारे कवच हैं। उन्हीं में से एक है वनवन जो हमारे अस्तित्व एवं विकास के लिये आवश्यक है। वन पर्यावरण, लोगों और जंतुओं को कई प्रकार से लाभ पहुंचाते हैंजिसमें वन हमें भोजन ही नहीं वरन जिंदगी जीने के लिए हर जरूरी चीजें मुहैया कराती है। पेड़ पृथ्वी के लिये सुरक्षा कवच का काम करते हैं और पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं, इसलिए यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि वनों का मानव जीवन के अस्तित्व में अहम योगदान है।


नेपाल के 40 प्रतिशत भूभाग में वन क्षेत्र फैला हुआ है। वहीं जिला वन कार्यालय, सप्तरी के तथ्यांक अनुसार नेपाल के सप्तरी जिला के कुल भूभाग 1,35,928.80 हेक्टेयर में 25 प्रतिशत क्षेत्र यानि कि 34,179.30 हेक्टेयर वन फैला हुआ है। यहां पर हो रहे वनों के नुकसान को लेकर सप्तरी जिला के जिला वन अधिकारी नंद लाल राय यादव ने माना कि सप्तरी में वनों की स्थिति दयनीय है। वहीं वनों के नुकसान का प्रमुख कारण गरीबी, बेरोजगारी और चेतना की कमी है जिसे सुधारने के लिए पुरा वन विभाग लगा हुआ है। लेकिन कर्मचारियों की कमी की वजह से इस पर पूर्ण रूप से नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। 



वहीं भारत में 657.6 लाख हेक्टेयर यानि कि 22.7 प्रतिशत भूमि पर वन पाए जाते हैं जिसमें विगत वर्षों में 2.79 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास की भेंट चढ़ गये जबकि 25 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रत्येक साल घट रहे हैं। यहां यह उल्लेख करना दिलचस्प है कि भारत में ही अभी 27.5 करोड़ लोग वनों से होने वाली आय पर निर्भर हैं। पुर्वानुमानों के अनुसार वन विनाश की मौजूदा रफ्तार अगर जारी रहती है तो सन 2020 तक दुनिया की लगभग 15 प्रतिशत प्रजातियां धरती से लुप्त हो जायेगी। पेड़ों की अंधाधुध कटाई एवं सिमटते जंगलों की वजह से भूमि बंजर और रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है जिससे दुनियाभर में खाद्य संकट का खतरा मंडराने लगा ।


यूएनईपी के मुताबिक, विश्व में 50-70 लाख हेक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष बंजर हो रही है वहीं भारत में ही कृषि-योग्य भूमि का 60 प्रतिशत भाग तथा अकृषित भूमि का 75 प्रतिशत गुणात्मक ह्रास में परिवर्तित हो रहा है। भारत में पिछले नौ सालों में 2.79 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास की भेंट चढ़ गए जबकि यहां पर कुल वन क्षेत्रफल 6,90,899 वर्ग किलोमीटर है। वन न केवल पृथ्वी पर मिट्टी की पकड़ बनाए रखता है बल्कि बाढ़ को भी रोकता और मृदा को उपजाऊ बनाए रखता है।


वनों से जहाँ सजीवों के लिए भोजन तथा औषधियां तो वहीं उद्योगों को कच्चा माल प्राप्त होता है। वैज्ञानिकों की मानें तो विश्व की 25000 चिन्हित वनस्पति प्रजातियों में से महज 5000 प्रजातियों का ही औषधि प्रयोग हो रहा है जिसके एक छोटे से अंश से ही हमारी खाद्यान्न की आपूर्ति हो रही है। इनमें से लगभग 1700 वनस्पतियों को खाद्य के रूप में उगाया जा सकता है लेकिन मात्र 30 से 40 वनस्पति फसलों से ही पूरे विश्व को भोजन उपलब्ध हो पा रहा है। वनों से जीव-जंतुओं का खासा रिश्ता होता है। यदि वन होगा तभी हमारे जीव-जंतु भी बचे रहेंगे और तभी हम मानव भी।


भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं की प्रजाति में लगातार कमी आ रही है। अपने स्वार्थ के चलते मानव द्वारा किए गए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण बीते 40 सालों में पशु-पक्षियों की संख्या घट कर एक तिहाई रह गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि 52,017 प्रजातियों में से 18788 लुप्त होने के कगार पर हैं। दुनिया के 5490 स्तनधारियों में से 78 लुप्त हो चुके हैं तो 188 अधिक जोखिम की सूची में है वहीं 540 प्रजातियों पर खतरा मंडरा रहा है और 792 अति संवेदनशील सूची में शामिल है। 



हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण और प्राणी एक-दूसरे के पूरक हैं। पर्यावरण और प्रकृति के पारिस्थितिक तंत्र के असंतुलन से होने वाले दुष्प्रभावों से हमारी आबादी के मस्तिष्क पर चिंता की शिकन आना लाजिमी है जिसके लिए मानव जगत ही जिम्मेदार है। इन सबके बावजूद मानव ने ही प्रकृति संरक्षण के प्रेरणादायी उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं, जिनसे जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को मजबूती मिली है। मानव का कर्तव्य बनता हैकि अपने स्वार्थ को त्यागते हुए प्रकृति से निकटता बनाकर पृथ्वी को प्रदूषित होने से बचाए तथा विलुप्त होते जंगलों और उसमें रहने वाले पशु-पक्षियों की संपूर्ण सुरक्षा की जिम्मेदारी ले। वृक्षों की संख्या में इजाफा, जैविक खेती को प्रोत्साहन, माइक्रोवेव प्रदूषण में कमी करने जैसे अहम मुद्दों पर काम करने पर विशेष जोर देना होगा। मानव को अपनी गतिविधियों पर सोच-समझकर काम करना होगा जिससे कि इंसान प्रकृति से दुबारा जुड़कर उसका संरक्षण कर सके, अन्यथा वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं जब जैव विविधता पर मंडराता यह खतरा भविष्य में हमारे अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा दे।


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