नयी नौकरी(गूढ़ रहस्य)


नयी नौकरी (गूढ़ रहस्य)


ज्ञान की हस्ती को पति बनाकर,


जीवन को जीने लगे।


धरती और आकाश भी,


फूलों की वर्षा करने लगे।


प्रिय जोड़ा कहीं बिछुड़ न जाये खूब ज्यादा प्यार करने लगे।


उसकी हर मुस्कुराहट पर हम अपनी कलाएँ बिखेरने लगे।


तरह-तरह की सखियां भी झूम-झूमकर गाने लगी।


शय्या छोड़कर शरीर त्यागकर


मंत्रमुग्ध होकर नाचने लगी।


सावन बीता, भादो बीता।


बारिश की बौछार कम होने लगी।


दीपक की बाती बनकर


धीरे-धीरे बुझने लगी।


स्वाति नक्षत्र की एक बूंद के लिये


चातक की तरह तरसने लगी।


विरह की एक नई नौकरी


स्वदेश में ही घायल करने लगी।


क्वार लग गया,


जल घट गया


पपीहा बनकर पीऊ को पुकारने लगी,


प्रिय तुम कहाँ हो, तुम कहाँ हो


शार्दुल बनकर अब तो मैं गरजने लगी।


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