कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ आवाज है जरुरी

समाज की प्रगति मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करती है कि हमारी सोच " कितनी प्रगाढ़, उन्मुक्त एवं भेदभाव से परे है। जब हम भेदभाव की बात करते हैं, तो लैंगिग भेदभाव को समझना भी आवश्यक हो जाता है। हमारी सोच पुरूषों एवं स्त्रियों में बहुत बड़ा अंतर डाल देती है, खासकर जब हम महिलाओं के  महिलाओं के कपड़े पहनने के तरीके एवं कार्यक्षेत्र में भागीदारी की तरफ देखते हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि * महिलाओं की सशक्त भागीदारी के बगैर एक बेहतर समाज या राष्ट्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज महिलाएँ हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा चुकी हैं, लेकिन कुछ निम्न सोच की वजह से हमारी स्वस्थ समाजिक व्यवस्था पर एक प्रश्नचिह्न लग जाता है। इसी क्षेत्र में महिलाओं का कार्यक्षेत्र में यौन शोषण भी आता है। जब तक हम महिलाओं को एक आनंद प्रदान करने वाली वस्तु मानते रहेंगे, तब तक किसी भी स्वस्थ समाज को जन्म नहीं दे सकते हैं।


कार्यक्षेत्र में यौन शोषण के दायरे में आने वाली गतिविधियाँ


किसी भी महिला का कार्यस्थल पर लैंगिक शोषण करना, अभद्र टिप्पणी करना, किसी के द्वारा जबरन यौन गतिविधि में शामिल होने के लिये दवाब बनाना यौन शोषण कहलाता है। अक्सर कई मामलों में कार्य क्षेत्र में होने वाले यौन शोषण अपमानजनक स्थिति पैदा करता है। कार्यस्थल पर यौन शोषण के रोकथाम हेतु कानून में कई तरह की गतिविधियों को शामिल किया जाता है, जिनमें कुछ निन्मलिखित बिंदु हो सकते हैं-



  • अश्लील चित्रों एवं फिल्मों को दिखाना।

  • कर्मचारी के इच्छा के विरूद्ध किसी भी प्रकार का यौन संपर्क।

  • यौन संबंधी बातें करना या यौन संबंधी गतिविधि में शामिल होने की बातें करना।

  • गलत तरीके से यौन टिप्पणी करना (इसमें बोलकर, लिखकर, ईमेल, मैसेज, ब्लॉग और वेब पेज का माध्यम भी आता है)।

  • अवांछित शारीरिक गतिविधि जिसमें छूना, किस करना, यौन क्रिया की इच्छा से किसी पर गलत दवाब डालना भी कार्यक्षेत्र में यौन शोषण के दायरे में आता है।


कार्यक्षेत्र में शौन शोषण को रोकने के लिये है दंड का प्रावधान -


 कार्यक्षेत्र में यौन शोषण को रोकने के लिये महिलाओं को आवाज बुलंद करने एवं आपराधिक कानून(संशोधन) अधिनियम 2013 के द्वारा भारतीय दंड संहिता में धारा 354 को शामिल किया है, जिसमें यौन शोषण के अपराधी के लिये दंड का प्रावधान है।


दरअसल कार्यस्थल पर यौन शोषण के मामले में वर्ष 1997 से पहले महिलाएँ अपनी शिकायत आइपीसी की धारा 354 एवं 509 के तहत दर्ज करवाती थीं, लेकिन राजस्थान में हुए भंवरी देवी रेप काड के बाद जयपुर एवं दिल्ली के कुछ के कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की, जिसकी सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के बाद विशाखा गाईडलाइन्स तैयार की जिसके तहत कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा के लिये कड़े नियम बनाए गये। विशाखा गाईडलाईन के तहत शिकायत की जाँच के लिये बनी कमेटी को अपनी जाँच 90 दिन के अंदर पूरी करनी होती है, एवं संबंधित संस्थान के नियुक्तिकर्ता एवं जिलाधिकारी को अपनी रिपोर्ट सौंपनी होती है। इसी रिपोर्ट पर 60 दिनों के अंदर निर्णय लिये जाने का प्रावधान है।


1997 से लेकर 2013 तक दफ्तरों में विशाखा गाइडलाइन्स के आधार पर ही इन मामलों को देखा जाता रहा लेकिन 2013 में सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट' आया आया, जिसमें विशाखा गाइडलाइन्स के अनुरूप ही कार्यस्थल में महिलाओं के अधिकार को सुनिश्चित करने की बात कही गई। इसके साथ ही इसमें समानता, यौन शोषण से मुक्त कार्यस्थल बनाने का प्रावधान भी शामिल किया गया‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट के तहत ऑफ़िस में इस समिति की स्थापना की जाती है। इस समिति में नामित सदस्यों में से आधी महिला होनी चाहिए. साथ ही इसमें एक सदस्य यौन-हिंसा के मामलों पर काम करने वाली किसी एनजीओ की सदस्य होनी चाहिए।


अगर कार्यस्थल पर कोई महिला कर्मचारी यौन शोषण जैसी घटना की शिकार होने जैसी हालात में है तो सबसे पहले अपने ऑफ़िस में बनी इस समिति में जा सकती है, या पुरूष कर्मचारी भी जा सकते हैं। गौरतलब है कि इस समिति के दिशानिर्देश दफ्तर में काम करने वाले सभी कर्मचारियों पर लागू होते हैं। ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट' के अन्तर्गत किसी भी महिला को कार्यस्थल पर यौन शोषण के ख़िलाफ़ सिविल और क्रिमिनल दोनों ही तरह की कार्रवाई का सहारा लेने का अधिकार हैलिहाज़ा, यौन शोषण से पीड़ित व्यक्तियों के लिये कई विकल्प हैं, जरूरत है खुद को शक्तिहीन न समझकर आवाज उठाने की।


(लेखक दिल्ली न्यायालय में अधिवक्ता हैं। मो. 9717420476)


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