आज़ादी के मायने - महिला खिलाड़ी की नज़र में


इसके पहले कि मैं विमेन पावर, फ्रीडम, इक्विटी एण्ड सेन्स ऑफ जस्टिस  की बात करूँ जो आज के समाज में अहम मुद्दे हैं, उन तथ्यों पर प्रकाश डालना चाहूँगी जिनकी वजह से आज मुझे यह मौका मिला है कि आपके समक्ष अपने विचार प्रस्तुत कर सकूँ।


        उन के लिए जो मेरे दौड़ने के जीवन से अवगत नहीं हैं। मैं 1992 में मैराथन एशियन चैंपियन बनी। पिछले 25 सालों से मैं दौड़ का अभ्यास कर रही हूँ और अब तक करीबन 110,000 कि॰मी॰ पूरे कर चुकी हूँ। प्रतिदिन 5 कि॰मी॰ दौड़ का अभ्यास करती हूँ। अपने मैराथन कैरियर में 1984-2008 तक पूरे 24 साल प्रतिदिन 20-25 कि॰मी॰ दौड़ का अभ्यास किया। मैंने 26 देशों में 200 से भी अधिक स्पर्धाओं में भाग लिया है। मेरी पहली विदेशी मैराथन अमरीका में हुई। 1985 बॉस्टन मैराथन में हिस्सा लिया एवं पहली बार 1985 में देश का प्रतिनिधित्व किया।


मैराथन 42.2 कि.मी. की दौड़ होती है और यह दूरी पुरूष व महिलाओं के लिए एक समान होती है और वे एक साथ दौड़ शुरू करते हैं पर परिणाम अलग-अलग आँके जाते हैं। मैंने पहली मैराथन 1984 में दिल्ली में पूरी की। 1983 से पूर्व महिलाओं के लिए यह स्पर्धा हिन्दुस्तान में नहीं थी। क्योंकि पुरूष प्रधान समाज का यह मानना था कि 42.4 कि.मी. महिलाओं के लिए काफी कठिन है। इस तरह इन आज़ादी के सालों में महिलाओं को मैराथन में हिस्सा लेने की आज़ादी 1983 से मिली। यदि यह आज़ादी न मिली होती तो आज मैं मैराथन धाविका न होकर किसी विश्वविद्यालय में लोकप्रशासन की प्राध्यापिका होती।


मैं एक राजपूत घराने की लड़की हूँ जहाँ 40-50 साल पहले बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। मैंने भी एक गांव में जन्म लिया है और अपनी जिन्दगी के 5 साल गांव में ही बिताये हैं।


सौभाग्यवश मेरा परिवार शिक्षित था जिसकी वजह से मुझे सभी प्रकार से अपने व्यक्तित्व में निखारने की आज़ादी मिली, साथ ही मेरे माता पिता ने मुझे पढ़ाने के और पंचमुखी शिक्षा देने के सभी साधन उपलब्ध कराये।


मैंने वनस्थली विद्यापीठ से बी.ए. एवं जयपुर से एम.ए. लोकप्रशासन में प्रथम श्रेणी में उतीर्ण कर एन.सी.सी., पैराशूट जम्प, नृत्य कला व खेलों में बराबर प्रभावशाली प्रदर्शन दिया।


यदि दुर्भाग्यवश मैं उन लाखों लड़कियों की तरह होती जिन्हें समाज में पैदा होते ही मार दिया जाता था तो आज यह आज़ाद सुनिता न होती और मैराथन चैम्पियन न होती।


वास्तव में इन आज़ादी के सालों में कई सामाजिक कुरीतिया टूटी हैं और महिलाओं  को कई तरह से स्वयं को उभारने की आज़ादी मिली है, परन्तु इस प्रकार खेलों में हिस्सा लेना अभी भी कई महिलाओं के लिए एक सपना मात्र है, और यह एक कटु सत्य है क्योंकि आज भी जिन महिलाओं ने भारत में मैराथन दौड़ पूरी की है उनकी संख्या सिर्फ 100 है। आज भी कई सामाजिक कुरीतियां, कानून, नियम, जैसी समस्याएँ हैं, जिनके कारण महिलाएं खेलों मे आगे नहीं आ रही हैं।


खेलों की आज़ादी आज भी सिर्फ कुछ सौभाग्यशाली व दमखम वाली महिलाओं को ही प्राप्त है।


खेलना मेरी नज़र में आज़ादी है जिसमे हम अपनी ताकत, संयम व चुनौती देने की क्षमता को जांच सकते हैं। खेलों में हिस्सा लेना व अपनी अच्छी क्षमता दिखाना मेरी नज़र में एक शुद्ध, उत्तम व स्वच्छ जीवन व्यतीत करने का प्रतीक है।


खेलने व दौड़ने की आज़ादी क्या है, जहां आप प्रदूषण रहित वातावरण में बिना किसी अंगरक्षक के किसी भी समय मुँह अंधेरे या शाम को पार्क में, स्टेडियम में, सड़कों पर बिना किसी डर के दौड़ सकें व खेल सकें। जो महिलाओं के लिए भारत में एक सपना सा है। आपको मालूम है जब मैं पार्क या सड़कों पर 20 किलोमीटर दौड़ने निकलती, हमेशा 3-4 पुरूष धावक साथ रहते। अपनी सुरक्षा एक बहुत बड़ा मुद्दा है मेरी दौड़ने की जिन्दगी में।


यही कारण है कि महिलाओं को आज भी खेलने की आज़ादी नाममात्र को है और शायद अगले पचास साल लग जायेंगे इस पुरूष प्रधान समाज को बदलने में।


यदि महिला को सुविधाएँ मिले तो वह भी चमत्कार दिखा सकती है और हर क्षेत्र में पुरूष वर्ग की बराबरी कर सकती है और कुछ क्षेत्रों में आगे भी निकल सकती है। जैसे कि मुझे नहीं लगता कि पुरूष बच्चों को इन्सान बनाने में कभी भी स्त्रियों का मुकाबला कर पायेंगे। हम देखते हैं कि जहां महिलाओं को आगे आने का अवसर मिलता है वहां उनकी क्षमता पुरूषों से अच्छी दिखाई देती है। जैसे कि सारे शैक्षिक संस्थाओं में महिला वर्ग का परिणाम पुरूष वर्ग से अच्छा होता है। शारीरिक क्षमता में भी पुरूष से 10-30 प्रतिशत कम ताकत होने के बावजूद विश्व का 70 प्रतिशत कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है। लेकिन उनकी खेलों में हिस्सा लेने की इच्छा उतनी ही है जितनी की पुरूषों की। इसलिए मुझे उम्मीद है कि मेरा जीवन बहुत सी महिलाओं को खेल जगत में आगे आने के लिए प्रेरित करेगा।


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