संतों में अग्रणी थे संत रविदास


गुरु रविदास का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा के दिन संवत 1433 में हुआ था। इनके पिता राघवदास तथा माता का नाम करमा बाई था। इनकी पत्नी लोना एवं पुत्र विजय दास हुए। इनकी पुत्री का नाम रविदासिनी था। रविदास ने साधु संतों की संगति से पर्याप्त व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम इनके पैतृक व्यवसाय था और इन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। ये अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।


संत रविदास के जन्म दिवस पर नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से सम्मानित गैर सरकारी संस्था दर्शन मेला म्यूजियम डेवलपमेंट सोसायटी की प्रमुख उपलब्धि ‘पाठक मंच‘ का साप्ताहिक निःशुल्क कार्यक्रम ‘इन्द्रधनुष‘ की 653वीं कड़ी पाठक मंच का सचिव शिवानी दत्ता  की अध्यक्षता में किया गया जिसमें बताया गया कि “कुलभूषण कवि संत शिरोमणि रविदास उन महान संतों में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोकवाणी का अद्भुत प्रयोग रही है, जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है।


इनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण इनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न करते थे। प्रारंभ से ही रविदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना इनका स्वभाव बन गया था। साधु-संतों की सहायता करने में इनको विशेष आनंद मिलता था। ये प्रायः मूल्य लिए बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। इस स्वभाव के कारण इनके माता पिता अप्रसन्न रहते थे। इससे परेशान होकर रविदास के माता पिता ने रविदास को पत्नी समेत घर से भगा दिया। रविदास पड़ोस में एक अलग घर बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर भजन तथा साधु-संतों के सत्संग में व्यतित करते थे।”


 


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