देवदासी प्रथा समस्या और समाधान


सांस्कृतिक वैभव से पूर्ण भारत में परंपरागत रूढ़िवादिता के साथ अंधविश्वासों का भी प्रचलन रहा है। ऐसी अवांछित प्रथाओं में से एक है देवदासी प्रथा।


मध्ययुग में जो राजाओं और सामंतों का समय माना जाता है, तब बिना दास-दासियों के राजदरबार तथा महलों की कल्पना नहीं की जा सकती थी। उस मध्यकाल में ही राज सत्ता के साथ धर्म सत्ता का महत्व भी बढ़ता गया। मंदिरों और मठों में पुजारियों तथा मठाधीशों के अनेक प्रकार के अधिकारों तथा वैभव का उल्लेख मिलता है। उस समय के कई राज्यों में राजा से अधिक प्रतिष्ठा वहाँ के राजपुरोहितों और मठाधीशों की थी। तब से ही मंदिरों और पूजाघरों में (गिरिजाघरों में भी) सेवक तथा सेविकाओं को रखने की परंपरा चल पड़ी, जो अब तक विभिन्न रूपों में विद्दमान है।


इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि मंदिरों और पूजाघरों में दास-दासियों के रखने की प्रथा का आरंभ भाव भक्ति से प्रेरित था। वे मंदिर के देवता या देवी की सेवा कार्य के लिये पुजारियों अथवा मठ के महंतों के द्वारा नियुक्त किये जाते रहे थे। मंदिरों में बालिकाओं या नारियों के अर्पण का चलन लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में परिलक्षित होता है। बेविलोनियां, मिश्र, सीरिया और पश्चिम अफ्रिका के अनेक पूजास्थलों में स्त्रियाँ कई प्रकार के कार्य किया करती थी। भारत में इसका प्रचलन धार्मिक रीति-रिवाजों पर तांत्रिक मत तथा शैवसाधना पद्धति के प्रभाव से हुआ।


 ध्यान देने योग्य बात है कि भारत के अनेक मंदिरों में विद्दमान स्त्रीचक्र की प्रधानता तांत्रिक साधना पद्धति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसे में पूजा स्थलों में अर्पित की गई बालाएँ वहाँ की व्यवस्था का अभिन्न अंग बना दी गई थी। मंदिर के पूजा कार्यों में प्रधान पुजारी के साथ इनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका रहा करती थी। मंदिर के देवता को अपनी संतान अर्पित करने के पीछे कई प्रकार के कारण रहे हैं। इस प्रथा का चलन उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत की पिछड़ी जातियाँ, विशेषकर ग्रामीण अंचल में अधिक व्याप्त रहता है। अंधभक्ति तथा पंडा-पुजारियों के प्रभाव में कई दंपत्तियों ने पारिवारिक विकास के लिये धर्म स्थलों पर अपनी संतान को अर्पित करने की प्रथा को स्वीकार कर लिया था।


 


देवताओं की सेवा के लिये अर्पित की जाने वाली ऐसी बालाओं को भोगम, दासी, सूले या देवदासी के नाम से पुकारा जाता रहा है। देवता को अर्पित ये दासियां, पूजा-अर्चना के अलावा मंदिरों में नृत्य तथा गायन का भी कार्य करती हैं। ऐसी मान्यता है कि पूजा-अर्चना के साथ नाच- गान से देवता प्रसन्न होते हैं, और वांछित कार्य पूर्ण होने का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।


मंदिरों के पंडे-पुजारियों ने स्थानीय सामंतों से मिलकर देवदासियों और सुमंगलियों को संस्थागत रूप में स्थापित करने का कुचक्र भी किया। काली- दुर्गा जैसी देवियों के समानांतर येलम्मा तथा खंडोवा देवी की पूजा के साथ बालिकाओं को अर्पित किये जाने की रीति चलाई। इस प्रकार धर्म की ओट में व्यभिचार पनपने लगा। आंध्रप्रदेश, कर्नाटक तथा तमिल क्षेत्र के अलावा मराठवाड़ा में भी इसका प्रचार-प्रसार बढ़ता गया। देवदासी बनने की प्रकिया में नग्न होकर स्नान करने के बाद अश्लील नृत्य करना भी धार्मिक क्रिया मान ली गई है। इसके साथ वाममार्गियों ने पंच मकार-यथा मदिरा, मत्स्य, मांस,मुद्रा तथा मैथुन को स्वीकृति प्रदान कर दी। फलस्वरूप मंदिरों में धर्म के नाम पर व्यभिचार फैलने लगा। समाज में फैलती ऐसी अवांछित स्थिति को देखकर कई सामाजिक नेता तथा धर्मप्राण व्यक्ति भी सजग हुए।



धर्म के नाम पर पनपते ऐसे व्यभिचार को रोकने तथा मंदिरों की धार्मिक प्रतिष्ठा को बचाए रखने के लिये प्रयास किये गये। बीसवीं सदी के आरंभ में कुछ नियम और कानून भी बनाए गये, किंतु फिर भी धार्मिक वेशेया के रूप में पनप रही देवदासी की प्रथा को नियंत्रित नहीं किया जा सका। इसका मुख्य कारण मंदिर और मों की व्यवस्था में लगे हुए पुरूषों की स्वेच्छारिता तथा देवदासी के रूप में धार्मिक वेश्या बनी स्त्रियों की निर्धनता है। यह कटु सत्य है कि केवल कानून बना देने से कोई भी सामाजिक सुधार संभव नहीं हो सका है। धार्मिक वेश्या के रूप में प्रचलित देवदासी प्रथा को नियंत्रित करने के लिये कई अन्य प्रकार के प्रभावी कदम उठाने होंगे।


धार्मिकता के नाम पर यौन शोषन और दासदासियों पर किये जा रहे अत्याचारों को रोकने के लिये केन्द्र तथा राज्य सरकार ने समय-समय पर कई नियम तथा अधिनियम बनाए हैं, किंतु इनका पूरी तरह से पालन नहीं हो पा रहा है। इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि देवी-देवताओं को अर्पित कन्याएं अधिक संख्या में पिछड़ी और दलित जातियों की होती हैं, जिन्हें विवश होकर जीवनयापन के लिये वेश्यावृत्ति या भिक्षाटन का सहारा लेना पड़ता है। अतएव इस प्रथा को समाप्त करने के लिये उनकी आर्थिक स्थिति को सुधार कर ऐसे धार्मिक व्यभिचार पर अंकुश लगाने की जरूरत है।


 


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