कुत्ते से शादी कराने की अनोखी परंपरा

 बुरूहुंडुरू गांव, प्रखंड गोईलकेरा, उरांव टोली में पैदा हुई। तबसे गांव में आदिवासियों की एक परंपरा बचपन से देखती आ रही हैं। दरअसल यह परंपरा बच्चे और बच्ची के जन्म से जुड़ी है। आदिवासी समुदाय में जब किसी बच्चे के जन्म के छठे या सातवें महीने (जब दांत निकलने का समय होता है) में पहली बार दांत निकलता है, और उसके ऊपर की तरफ दो दांत आते हैं, तो उसे अशुभ माना जाता है। दरअसल, इसे किसी ग्रह का प्रभाव माना जाता है, जिसे दूर करने के लिये आदिवासी समुदाय उस बच्चे की शादी कुत्ते से कराते हैं। शादी 5 या 6 साल की उम्र में कराई जाती है, ताकि जब बच्चा बड़ा होता है तब वह अपने बचपन की यादें भूल जाता है।इसे मान्यता कहें या परंपरा, कुत्ते के साथ उस प्रकार के दांत वाले वाले बच्चे की शादी बिल्कुल वैसे ही कराई जाती है, जैसे आम शादियाँ होती है। गाँव के ही लोग दो पक्ष में बंट जाते हैं । एक वर पक्ष और दूसरा वधू पक्ष। बारात निकलती है। नेग लिया और दिया जाता है। भोज-भात, नये कपड़े, नाच-गाने और बैंड बाजे का इंतजाम किया जाता है। शादी पूरे रीति-रिवाज़ के साथ कराई जाती है। शादी कराने के लिये पंडित की जगह बच्चे की दादी, नानी या फिर भाभी की भूमिका होती है। लेकिन इस शादी में सिंदूर की जगह ईंट के चूर्ण या फिर अबीर का प्रयोग किया जाता है। यहाँ तक कि शादी के बाद तीन बार विदाई का भी चलन है, जिसमें लड़का और लड़की के वर पक्ष एवं वधू पक्ष के घर आने-जाने के क्रम के बाद इस शादी का पूर्ण होना माना जाता है। सबसे खास बात यह है कि शादी के इन रस्मों के कुछ समय या दिन के बाद उस कुत्ते की मृत्यु हो जाती है, जो इस ग्रह दोष से जुड़ी परंपरा और मान्यता को और भी पुख़्ता करता है। इस रिवाज़ का मैं भी एक हिस्सा रही हूँ, और आज भी यह परंपरा कायम है।


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